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Friday, September 17, 2021

Opinion: वीर सावरकर फिर आये राजनीति के केन्द्र बिन्दु में, क्या है उनका हिंदुत्व और हिंदू राष्ट्र ?

जयपुर. एक शतााब्दी बाद भी वीर सावरकर (Veer Savarkar) और उनके हिंदुत्व तथा हिंदू राष्ट्र (Hindutva and Hindu Rashtra) की अवधारणा चर्चा में है. बीजेपी (BJP) सावरकर की इस विरासत पर गर्व करती आई तो कांग्रेस (Congress) इसे विभाजनकारी अवधारणा बताती आई है. अब एक बार फिर से राजस्थान की राजनीति में इस पर बहस छिड़ी हुइ है. कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता नेता का कहना कि उस वक्त सावरकर का हिंदुत्व की बात करना गुनाह नहीं था न ही आजादी के आंदोलन में उनके योगदान को नकारा जा सकता है. सावरकर हिंदुत्व को लेकर चर्चा में तब आए जब वे रत्नागिरी की जेल में बंद थे. तब पहली बार 1921 में हिंदुत्व के नाम से एक पुस्तक लिखी.

सावरकर की ये पुस्तक 1923 में प्रकाशित हुई लेकिन पुस्तक का टाइटल और लेखक अलग था. वजह थी कि सावरकर को जेल में लेखन की आजादी नहीं थी. सावरकर का हिंदुत्व आखिर है क्या ? क्यों क्रांतिकारी सावरकर ने हिंदू राष्ट् का विचार रखा ? इन दौ मौलिक सवालों का जबाब मिलता है सावरकर की जिंदगी पर लिखी वैभव पुरंदरे की पुस्तक ‘सावरकर दा ट्रयू स्टोरी ऑफ दा फादर ऑफ हिंदुत्व’ से. सावरकर के हिंदुत्व का हिदू धर्म से खास संबध नहीं है. सावरकार का हिंदुत्व एक राजनीतिक विचार है न कि धार्मिक.

सावरकर के हिंदुत्व का मतलब हिंदू जीवन पद्धति

सावरकर के हिंदुत्व का मतलब हिंदू जीवन पद्धति और हिंदु सभ्यता में गर्व करने वाले लोग हैं. सावरकर के हिंदू राष्ट्र की अवरधारणा सप्त सिंधु में निवास करने वाले लोगों से है. सावरकर के हिंदुत्व में हिंदू वे हैं जिनकी पितृभूमि (Fatherland) और पुण्य भूमि (Worship land) दोनों सप्त सिंधु यानी हिंदुस्तान में हो. जिनकी पितृभूमि सप्त सिंधु में है लेकिन पुण्य भूमि कहीं और उन्हें ये साबित करना होगा कि वे दोनों से किसे चुनेंगे पितृभूमि या पुण्य भूमि. अगर पितृभूमि को चुनते हैं तो वे हिंदू राष्ट्र में है अगर पुण्य भूमि को चुनते हैं तो फिर हिंदू नहीं.

हिंदुओं, सिखों और बौद्धों की पितृभूमि और पुण्य भूमि दोनों हिदुस्तान है

सरल शब्दों में मुसलमानों की पितृभूमि यानी जन्मस्थल भले ही हिंदुस्तान हो लेकिन पुण्य भूमि हिन्दुस्तान के बाहर मक्का में है. वे हिंदुत्व की इस अवधाराणा से सवाल खड़ा कर रहे थे कि मुसलमान के सामने अगर चुनने का हक होगा तो क्या वे पितृभूमि को चुनेंगे या फिर पुण्य भूमि को. जबकि हिंदुओं, सिखों और बौद्धों की पितृभूमि और पुण्य भूमि दोनों हिदुस्तान है.

क्यों चाहते थे सावरकर हिंदू राष्ट्र

सावरकर इंग्लैंड में पढ़े थे. वे सोच से आधुनिक थे. अंडमान की सेलुलर जेल भेजे जाने तक वे सेकुलर थे. 1857 की क्रांति के मुस्लिम नायकों के भी मुरीद थे. लेकिन अंडमान की सेलुलर जेल ने सावरकर की सोच और विचारों को बदल कर रख दिया. सावरकर दा ट्रू स्टोरी ऑफ दा फादर ऑफ हिंदुत्व में लिखा है कि सेलुलर जेल में अधिकतर कैदी हिंदू थे. लेकिन उन पर निगरानी के लिए वार्डर से लेकर जेल गार्ड और ओहदेदार सिंधी बलूची तथा पठान मुस्लिम थे. हिंदुओं को ये जिम्मेदारी नहीं दी जाती थी. ये अंग्रेजो की रणनीति थी. जेल में हिंदू बंदियों और क्रांतिकारियों को परेशान करने की.

अंग्रेजों ने अपना रखी थी ये रणनीति

सावरकर की बायोग्राफी समेत उनके जाीवन पर लिखी दूसरी पुस्तकों में लिखा कि कैसे जेल में धर्म के आधार पर भेदभाव और धार्मिक उत्पीड़न होने लगा. उत्पीड़न से बचने के लिए कैदी दबाब में धर्म परिवर्तन करने लगे. सावरकर ने इस भेदभाव और धार्मिक उत्पीड़न के खिलाफ जेल में आवाज उठाई और फिर सावरकर के विचार बदलने लगे. सावरकर को जब रत्नागिरी जेल मे शिफ्ट किया गया तब वहां पर भी वैसी ही परिस्थितियां मिली. अंग्रेजों ने देश की अधिकतर जेल में हिदू मुस्लिम के बीच दरार के लिए ये रणनीति अपना रखी थी. लेकिन जेल के सिर्फ ये अनुभव ही उनकी हिंदुत्व की इस अवधारणा के पीछे वजह नहीं थी. इसकी वजह और भी थी. आजादी के आंदोलन के वक्त मुस्लिमों की धर्म के आधार प्रतिनिधित्व की मांग और बढ़ता कट्टरवाद भी इसमें एक प्रमुख वजह थी. कुछ घटनाएं ऐसी थी जिनकी वजह से सावरकर को अपने ही देश में हिंदुओं की असुरक्षा की चिंता सताने लगी.

ये बातें बनी प्रमुख वजह

– 19वीं सदी की शुरुआत में हुआ था वहाबी आंदोलन. सर सैयद अहमद खान बरलेवी ने इसे शुरू किया था. इसका मकसद था भारत में दारुल उल इस्लाम यानी मुस्लिम शासन लागू करवाना. दारुल उल हर्ब यानी दुश्मन की टैरिटरी में मुस्लिम शासन व्यवस्था लागू करने की इस मुहिम को हैदराबाद के निजाम समेत कुछ मुस्लिम शासकों का समर्थन था. इससे हिंदू मुस्लिम के बीच खाई बढ़ने लगी. बिजनौर में कोर्ट ऑफिसर सैयद अहमद ने 1888 में पहली दफा टू नेशन थ्योरी की मांग रखी और कहा कि हिंदू और मुस्लिम एक साथ नहीं रह सकते है. अंग्रेजों के जाने के बाद मुस्लिमों के लिए सेपरेट इलक्ट्रोरेट की मांग की गई.

– 1883 में आमिर अली ने मुस्लिमों के लिए अलग से प्रतिनिधित्व की मांग की. आमिर अली ग्लोबल इस्लिमक मूवमेंट का हिस्सा थे. उसका मकसद पैन इस्लिज्म था. मुस्लिम खलीफा यानी टर्की के सुल्तान का हिंदुस्तान के मुस्लिमों से सबंध स्थापित करना. यानी हिंदुस्तान के मुसलमानों की आस्था सुल्तान में व्यक्त करवाना.

– 1906 में आगा खान की अगुवाई में कुछ मुस्लिम धर्मगुओं ने वायसरॉय मिंटो से शिमला में भेंट की. इस मुलाकात में धर्म के आधार पर सिविल बॉडीज से लेकर लेजिसलेटिव काउंसिंल में मुस्लिमों को प्रतिनिधित्व देने की मांग रखी गई. लार्ड कर्जन ने इसी मांग को आधार पर बनाकर बंगाल का धर्म के आधार पर विभाजन कर दिया था.

-1906 में मुस्लिम लीग की स्थपना हुई और उसने मुस्लिमों की इकलौती प्रतिनिधि होने का दावा कर दिया. फिर शौकत अली की अगुवाई में हुए खिलाफत आंदोलन ने भी सावरकर की हिंदु राष्ट्र की सोच को और बल दिया. इस आंदोलन का मकसद था खलीफा की बहाली और अरब जगत से हिंदुस्तान के मुसलमानों का संबध जोड़ना.

– 1921 में मालाबार तट के नजदीक रहने वाले मोफला मुस्लिम समुदाय के जिहाद के ऐलान ने सावरकर की हिंदू राष्ट्र की सोच को और मजबूत किया. मोफला विद्रोहियों ने 600 हिंदुओं की हत्या की और 2500 का धर्म परिवर्तन कराया. सावरकर खुद प्रेक्टिसिंग हिंदू नहीं थे. यानी वे न तो पूजा पाठ करते थे न ही वर्णाश्रम धर्म की कठोरता से पालन के पक्षधर थे. न वे गौ पूजा के पक्ष में थे. लेकिन एक राष्ट्र की उनकी परिकल्पना हिंदू राष्ट्र की थी. यानी सप्त सिंधु हिंदुओं की भूमि है तो उस पर अधिकार और फैसलों का हक भी हिदुओं का हो.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)

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