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Sunday, September 19, 2021

अंतर-धार्मिक विवाहः मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का एतराज़ और ज़मीन हक़ीक़त

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अंतर धार्मिक विवाह के ख़िलाफ़ मैदान में उतर गया है. बोर्ड ने बाक़ायदा एक बयान जारी करके मुसलमानों और ग़ैर-मुसलमानों के बीच होने वाली शादियों को ग़ैर-इस्लामी क़रार दिया है. साथ ही मुसलमानों को ऐसी शादियों से बचने की नसीहत दी है. बोर्ड के इस बयान पर कई सवाल भी उठ रहे हैं. अंतर-धार्मिक विवाह के पक्षधर इसे बोर्ड की दकियानूसी सोच बता रहे हैं. वहीं अपने ही समाज में शादियों के पक्षकार इसे देर से उठाया गया एक अच्छा क़दम मान रहे हैं.

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने अंतर-धार्मिक शादियों पर अफसोस जताया है. बोर्ड का कहना है कि मुस्लिम लड़का मुसलमान लड़की से और मुसलमान लड़की मुस्लिम लड़के से ही शादी करे. बोर्ड की तरफ से इसके कार्यवाहक महासचिव मौलाना ख़ालिद सैफ़ुल्लाह रहमानी ने प्रेस नोट जारी किया है. इसमें कहा गया है कि मुस्लिम लड़के लड़कियों का गैर मुस्लिमों से शादी करना धार्मिक रूप से ग़लत है. शरीयत के मुताबिक़ इस्लाम में ऐसी शादियों की गुंजाइश नहीं है. अगर कोई मुसलमान किसी ग़ैर मुस्लिम से शादी करता है तो वो ज़िंदगी भर ग़लत करता रहेगा. बोर्ड ने मुस्लिम लड़के और लड़कियों की ग़ैर मुस्लिमों से शादी के बढ़ते ट्रेंड का ग़लत क़रार दिया है.

बोर्ड की मुख्य अपील

बोर्ड ने अपने बयान में मुख्य रुप से ये अपील की हैः

• उलमा-ए-किराम जलसों में इस विषय पर ख़िताब करें और लोगों को इसके अंतर-धार्मिक शादियों के नुकसान के बारे में जागरूक करें.

• महिलाओं के इज़्तेमा अधिक से अधिक हों और उनमें सुधारात्मक विषयों के साथ इस मुद्दे पर भी चर्चा करें.

• मस्जिदों के इमाम जुमे की नमाज़ को वक़्त अपने खिताब में क़ुरआन और हदीस के हवाले से इस विषय पर चर्चा करें और लोगों को बताएं कि उन्हें अपनी बेटियों को कैसे प्रशिक्षित करना चाहिए ताकि ऐसी घटनाएं न हों.

• आमतौर पर रजिस्ट्री कार्यालय में शादी करने वाले लड़के या लड़कियों के नामों की सूची पहले ही जारी कर दी जाती है. धार्मिक संगठन, संस्थाएं, मदरसे के शिक्षक गणमान्य लोगों के साथ उनके घरों में जाकर समझाएं और ऐसा शादियां करने से रोकें.

• मुसलमान अपनी लड़कियों को को-एड के बजाय लड़कियों के वाले स्कूल कॉलेजों में ही पढने भेजें और ये सुनिश्चित करें कि स्कूल-कॉलेज के बाद उनका सारा वक़्त घर में ही गुज़रे• मुसलमान अपने लड़के-लड़कियों के मोहबाइल पर विशेष तौर पर निगरानी रखें.

• लड़कों और विशेषकर लड़कियों की शादी में देरी न हो. समय पर शादी करें. क्योंकि शादी में देरी भी ऐसी घटनाओं का एक बड़ा कारण है.

• निकाह सादगी से करें. इसमें बरकत भी है, नस्ल की सुरक्षा भी है और अपनी क़ीमती दौलत को बर्बाद होने से बचाना भी है.

लव जिहाद का हवाला

बोर्ड ने अपने इस बयान के पीछे ‘लव जिहाद’ के मुद्दे का भी हवाला दिया है. बयान में कहा गया है कि हाल के दिनों में ‘लव जिहाद’ का मामला काफ़ी राजनीतिक हो गया है. मुस्लिम लड़कों पर ग़ैर-मुस्लिम लड़की से शादी करके उनका धर्म बदलवाने का आरोप है. कई राज्यों में इसके ख़िलाफ़ क़ानून भी लाया गया है. बोर्ड का कहना है कि ऐसे आरोपों से बचने के लिए बेहतर है कि मुस्लिम लड़के और लड़कियां अपने समाज यानि मुस्लिम समाज से ही अपना जीवन साथी चुनें. हालांकि बोर्ड ने अपने बयान में मुसलमानों के अलावा किसी और धर्म का नाम नहीं लिया है.

क्या कहते हैं मुस्लिम संगठन

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड तमाम मुस्लिम संगठनों का संगम है. सभी संगठनों से जुड़े लोग इसमें शामिल हैं. लिहाजा जमीअत उलमा-ए-हिंद से लेकर से लेकर जमात-ए-इस्लामी हिंद तक तमाम मुस्लिम संगठनों की इस मुद्दे पर वही राय है जो बोर्ड की राय है. लंबे समय तक बोर्ड के प्रवक्ता रहे जमात-ए-इस्लामी से जुड़े सैयद क़ासिम रसूल इलियास का कहना है कि देश में ‘लव जिहाद’ के नाम पर जिस तरह नफ़रत का माहौल बनाया जा रहा है उससे बचने का यही तरीक़ा है कि मुसलमान नौजवान लड़के और लड़कियां अपने मज़हब में ही अपना जीवन साथी तलाश करें. उनका कहना है कि संघ परिवार मुस्लिम लड़कियों को प्रेमजाल में फंसाने के लिए हिंदू नौजवानों की फौज तैयार कर रहा है. बोर्ड ने इससे बचने के लिए अपील जारी की है.

क्या कहते हैं सुधारवादी मुसलमान

मुस्लिम समाज में सुधारवादी आंदोलन चला रहे संगठन ‘इंडियन मुस्लिम फॉर प्रोग्रेस एंड रिफॉर्म’ के संयोजक डॉ एमजे ख़ान को ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के इस बयान में कोई ख़राबी नजर नहीं आती. उनके मुताबिक़ यह सलाह है ना कि कोई ऐसा आदेश जिसका पालन करना सबके लिए ज़रूरी हो. उनका कहना है कि समाज में अंतर धार्मिक खासकर हिंदू-मुस्लिम विवाह की स्वीकार्यता पहले के मुकाबले कई गुना बढ़ी है. लेकिन उन मुस्लिम परिवारों के सामने दिक्क़तें आती हैं जिनकी लड़कियां किसी हिंदू से शादी कर लेती हैं. उनके बाकी बच्चों की शादियां नहीं हो पातीं. ठीक इसी तरह हिंदू लड़की के किसी मुसलमान से शादी करने पर उसके परिवार का हिंदू समाज में बहिष्कार होता है. उनका कहना है कि अगर हिंदू-मुस्लिम तनाव से बचने के लिए बोर्ड ने यह बयान जारी किया है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए. अगर उसका मक़सद ज़ोर ज़बरदस्ती से अंतर धार्मिक शादी रुकवाने का है तो इसकी मुख़ालफ़त होनी चाहिए. एमजे ख़ान कहते हैं कि अलग-अलग धर्मों के लोग अगर स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत शादी करते हैं तो इसमें किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए. लेकिन ऐसी शादियों में परिवार की रज़ामंदी और शादी के मौक़े पर परिवार की मौजूदगी को अनिवार्य बना दिया जाए.

क्या कहता है कुरआन?

कुरआन में शादी को लेकर स्पष्ट निर्देश हैं. इसमें साफ़-साफ़ बताया गया है कि किससे किन परिस्थियों में शादी हो सकती है और किससे नहीं हो सकती. क़ुरआन में मुसलमानों को ईसाई और यहूदी औरतों से शादी करने की तो छूट दी गई है. लेकिन मुशिरक यानि बहुदेववादी औरतों से शादी करने की इजाज़त नहीं है. उनसे उसी सूरत में शादी की जा सकती है जब वो इस्लाम क़ुबूल कर लें.

कौन हैं मुशरिक?

मुशरिक कौन है इस पर लंबी बहस हो सकती है. क़ुरआन के मुताबिक़ सृष्टि का रचयिता अल्लाह है. मुसलमान सिर्फ़ अल्लाह की इबादत यानि पूजा करते है और उसी से मदद मांगते है. अल्लाह को छोड़कर किसी और की इबादत करना और किसी और से मदद या मन्नत मांगना शिर्क कहलाता है. शिर्क करने वाले को मुशरिक कहते हैं. भारतीय परिप्रेक्ष में मूर्तिपूजा करने वाले हिंदू, बौद्ध, जैन धर्म के लोग मुशरिक हुए. लेकिन मुस्लिम समुदाय में भी कई फिरक़े हैं. कई मसलक हैं. इन फिरक़ों और मसलकों से जुड़े मुसलमान अपने पीरों से मन्नत मांगते हैं. दरगाहों पर जाकर भी मन्नत मांगते हैं. क़ुरआन की परिभाषा के मुताबिक़ ये सभी मुशरिक हुए. बोर्ड को बताना चाहिए कि क्या मुसलमानों को दूसरे फिरकों में भी शादियां करनी चाहिए या नहीं.

मुशरिकों से शादी पर क़ुरआन का आदेश

कुरआन की सूरः बक़रा की आयत नं. 221 में ईमान वालों यानि मुसलमानों को बहुदेववादी औरतों से शादी के बारे में हुक्म दिया गया है. इसमें कहा गया है, ‘और मुशरिक (बहुदेववादी) स्त्रियों से विवाह न करो जब तक कि वे ईमान न लाएं. एक ईमानवाली बांदी (दासी), मुशरिक स्त्री से कहीं उत्तम है; चाहे वह तुम्हें कितनी ही अच्छी क्यों न लगे. और न (ईमानवाली स्त्रियों का) मुशरिक पुरुषों से विवाह करो, जब तक कि वे ईमान न लाएं. एक ईमानवाला ग़ुलाम आज़ाद मुशरिक से कहीं उत्तम है, चाहे वह तुम्हें कितना ही अच्छा क्यों न लगे. ऐसे लोग आग (जहन्नम) की ओर बुलाते हैं और अल्लाह अपनी अनुज्ञा से जन्नत और क्षमा की ओर बुलाता है. और वह अपनी आयतें लोगों के सामने खोल-खोलकर बयान करता है, ताकि वे चेतें.’

ईसाई और यहूदियों से शादी की इजाज़त

क़ुरआन की सूरः अल-माइदा की आयत न. 5 में कहा गया है, ‘आज तुम्हारे लिए अच्छी स्वच्छ चीज़ें हलाल कर दी गईं और जिन्हें किताब दी गई उनका भोजन भी तुम्हारे लिए हलाल है और तुम्हारा भोजन उनके लिए हलाल है और शरीफ़ और स्वतंत्र ईमानवाली स्त्रियां भी, और वे शरीफ़ और स्वतंत्र ईमानवाली स्त्रियां भी जो तुमसे पहले के किताबवालों में से हों, जबकि तुम उनका हक़ (मेह्र) देकर उन्हें निकाह में लाओ. न तो यह काम स्वछन्द कामतृप्ति के लिए हो और न चोरी-छिपे याराना करने को. और जिस किसी ने ईमान से इनकार किया, उसका सारा किया-धरा अकारथ गया और वह आख़िरत में भी घाटे में रहेगा.’

क्या है निष्कर्ष?

क़ुरआन की उपरोक्त आयतों से यह निष्कर्ष निकलता है कि मुस्लिम पुरुष गैर-मुस्लिम महिलाओं से निम्नलिखित शर्तों के साथ विवाह कर सकते हैं:

• मुस्लिम पुरुष किताब के लोगों (यानी यहूदी और ईसाई) से महिला से शादी कर सकते हैं.

• मुस्लिम पुरुष बहुदेववादी महिलाओं से तब तक शादी नहीं कर सकते जब तक कि वो धर्म परिवर्तन नहीं करती.

हालांकि ऐतिहासिक सुन्नी इस्लाम मुस्लिम महिलाओं को इस्लाम में ग़ैर-मुस्लिम पुरुषों से शादी करने पर रोक लगाता है. इस पर उलेमा के बीच ‘इज़्मा’ यानि आमसहमति है. इसके बावजूद कुछ मुस्लिम देशों में मुस्लिम महिलाओं और ग़ैर-मुसलमानों के बीच अंतर-धार्मिक विवाह होते हैं. उदाहरण के लिए अमेरिका में लगभग 10% मुसलमानों की शादी गैर-मुसलमानों से होती है. प्रगतिशील मुसलमानों की परंपरा मुस्लिम महिलाओं और ग़ैर-मुस्लिमों के बीच विवाह की अनुमति देती है. इस विचार को मानने वालों नें में ख़लील मोहम्मद , हसन अल-तुराबी जैसे इस्लामी विद्वानों शामिल हैं. ऐसी सोच वालों की तादाद बढ़ रही है.

दुनिया में स्थिति

कई अरब देशों ने ईसाई या यहूदी महिलाओं से अंतर्धार्मिक विवाह की अनुमति दी है. लेकिन ग़ैर-मुस्लिम पुरुषों को मुस्लिम महिला से शादी की इजाज़त नहीं है. लेबनान में भी यही क़ानून लागू था. लेकिन समय के साथ वहां इसे लचीला बनाया गया. मुस्लिम महिलाओं को ईसाई और यहूदी पुरुष से शादी की छूट दे दी गई. तुर्की पूरी तरह धर्मनिरपेक्ष कानूनों के माध्यम से गैर-मुस्लिम पुरुषों से विवाह की अनुमति देता है. ट्यूनीशिया में 16 सितंबर 2017 के बाद मुस्लिम महिलाओं को किसी भी आस्था के पुरुष से शादी करने की इजाज़त दे दी गई. मलेशिया में एक ग़ैर-मुस्लिम के लिए एक मुस्लिम से शादी करने के लिए इस्लाम क़ुबूल करना होता है. हर देश में अलग स्थिति है.

आदर्श स्थिति और भारत में ज़मीनी हक़ीक़त

क़ुरआन के आदेश आदर्श स्थिति है, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त इसके उलट है. सदियों से साथ रहते हुए दुनिया भर में मुसलमानों और ग़ैर-मुसलमानों के बीच आपसी वैवाहिक रिश्ते विकसित हुए हैं. शुरुआती खटपट के बाद इन्हें सामाजिक स्वाकार्यता भी मिली है. भारत भी इससे अछूता नहीं है. हिंदू-मुस्लिम शादियों की तादाद और सामाजिक स्वीकार्यता समाज में तेज़ी से बढ़ रही है. बॉलीवुड में तो ऐसी शादियां आम हैं. नगरिस से लेकर नुसरत जहां तक तमाम मुस्लिम हीरोइनों ने हिंदू जीवन साथी चुना है. पत्रकारिता और राजनीति में भी भी ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं. कईयों ने अपना धर्म भी बदला है. अंतर-धार्मिक विवाह में हर तरह की मिसाल मौजूद है. धर्म की दुहाई देकर इस सिलसिले को रोकना वक़्त के पहिए को उल्टा घुमाने जैसा है.

बोर्ड का दोहरा रवैया

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का दोहरा रवैया एक बार फिर सामने आया है. आज बोर्ड क़ुरआन का हवाला देकर अंतर-धार्मिक विवाह ख़ासकर हिंदू-मुस्लिम शादियों को रोकने की वकालत कर रहा है. यही बोर्ड पिछले कई साल से ‘तीन तलाक़’ के मसले पर क़ुरआन की आयतों की अनदेखी करके अपने गढ़े हुए क़ानून मुसलमानों पर थोपता रहा है. यह अजीब बात है कि बोर्ड को जब उचित लगता है तो वो क़ुरआन की बात करता है और जब उसे अपनी मनमानी करनी होती है तो वो क़ुरआन के ख़िलाफ़ भी चला जाता है. बोर्ड की इस दोहरी नीति के ख़िलाफ़ मुस्लिम समाज में आवाज़ उठने लगी है.

और भी हैं सवाल

क़ुरआन के बहुत सारे आदेश और दिशानिर्देश ऐसे हैं जिन पर अब इस्लामी देशों में भी अमल नहीं होता है. वैसे भी आदर्श स्थिति और ज़मीनी हक़ीक़त में काफी फ़र्क़ हो होता है. वक्त के साथ समाज और समाज की सोच भी बदलती है. आज बोर्ड हिंदू-मुस्लिम शादियों को ग़लत बता रहा है. कह रहा है कि ऐसा करने वाले जिंदगी भर ग़लत काम करते हैं. मुग़लकाल में 38 हिंदू मुस्लिम शादियां हुईं. अकबर से लेकर औरंगज़ेब तक कई बादशाहों और उनके शहज़ादों की शादियां राजपूत राजकुमारियों से हुईं और कई शहज़ादियों की शादियां राजपूत राजाओं और राजकुमारों से हुईं. सभी शादियां दोनों पक्षों की मर्ज़ी से हुईं. किसी भी शादी में किसी का धर्म नहीं बदला गया था.

औरंगज़ेब की हिंदू पत्नियां और बहुएं

उलेमा की दुनिया में मुग़ल बादशाहों में सबसे ज़्यादा सम्मान औरंगज़ेब का है. बड़े फ़ख़्र से उन्हें अपने समय का सबसे बड़ा नमाज़ी और परहोज़गार बताया जाता है. उनके नाम में उलेमा रहमतुल्ला अलैयह लगाते हैं. इस का मतलब होता है उन पर अल्लाह की रहमत हो. औरंगज़ेब के शासनकाल में लिखी हुई किताब ‘फ़तवा-ए-आलमगीरी’ तमाम दारुल उलूम यानि मुस्लिम विश्वविद्यालयों में पढ़ाई जाती है. औरंगजेब की दो बीवियां हिंदू थी नवाब बाई और उदयपुरी. इनका अपने पति से प्रेम और समर्पण इतना गहरा था कि एक पत्नी उदयपुरी का इरादा था कि अगर किसी वजह से औरंगजेब की मौत पहले हो जाए तो वो जीने की बजाए सती होना पसंद करेगी. औरंगज़ेब के तीन बेटों मुअज़्ज़म, आज़म और कामबख़्श की शादी हिंदू राजकुमारियों से हुई थीं.

तो ग़लत थे औरंगज़ेब?

क्या औरंगज़ेब ग़लत थे? वो ज़िंदगीभर ग़लत काम करते रहे? इस्लाम के इतने बड़े जानकार होने के बावजूद उन्होंने क़ुरआन की आयतों के ख़िलाफ़ जाकर हिंदू राजकुमारी से शादी की. वो भी बग़ैर उनके ईमान लाए. क्योंकि अगर वो मुसलमान हो गईं होती तो औरंगज़ेब की मौत के साथ ही सती होने की बात नहीं करतीं. क्या औरंगज़ेब के ज़माने में कोई और इस्लाम और कोई कोई क़ुरआन था. क्या औरंगज़ेब के लिए इस्लामी क़ानून कुछ मायने नहीं रखते थे. कुछ लोग कह सकते हैं कि औरंगज़ेब ने अपनी सत्ता के बूते ऐसा किया और सबको अपने कर्मों का हिसाब देना है. अगर औरंगज़ेब ग़लत थे तो फिर बोर्ड को उनकी लिखवाई किताब दारुल उलूमों के पाठ्यक्रम से हटवा देनी चाहिए.

बोर्ड की ये सलाह हिंदू-मुस्लिम दंपतियों के लिए बेचैनी का सबब बन सकती है. बोर्ड को मुसलमानों के लिए शरीयत से जुड़े मामलों में एडवाइज़री जारी करने का पूरा अधिकार है. लेकिन उसे उसे अपनी मर्ज़ी थोपने का अधिकार नहीं है. शादी धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक मामला है. देश क़ानून हर बालिग़ नागरिक को अपनी मर्ज़ी से अपना जीवनसाथी चुनने का आधिकार देता है. संविधान में दिए नागरिकों की व्यक्तिगत पसंद के अधिकार को कुचलने की इजाज़त किसी को नहीं दी जा सकती.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)

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