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Sunday, September 19, 2021

छत्तीसगढ़ी में पढ़ें : भूपेश बघेल के के गांव मं रोका-छेका

छत्तीसगढ़ सरकार के नरवा, गरवा, घुरवा योजना हा कतका अकन सफल होय हे तेला तो गांव वाले किसान भाई मन बता सकत हें, फेर सरकार दुसर योजना सही एकर सफल होय के ढिंढोरा तो पिटत हे| वइसने गोबर बेचे के घला योजना शुरू करे हे| शुरू मं तो सब हांसिन के ये सरकार हा का अतेक गिरगे हे के अब ओहर गोबर बेचही? का एकर करा अउ दुसर कोनो काम अउ योजना नइहे? हंसइया मन के मुंह ला तो कोनो तोप(रोक) नइ सकय| ओमन तो बने काम करही तभो हांसही, गिनहा करही तभो|

अब रोका छेका नवा अभियान शुरू करे हें| कतको झन के तो खोपड़ी मं नइ घुसत हे ये रोका छेका का बात हे, बला हे? अब जउन गांव संस्कृति मं पले, ढले अउ बढ़े नइहे, शहरिया डिंग मारत रइहीं तउन एला का समझही के ये का योजना अउ अभियान हे? छत्तीसगढ़ के मुखिया भूपेश बघेल गांव मं पले, ढले अउ बढ़े हे, खेले कूदे हे तब ओहर जानत हे, समझत हे के का-का उदिम होथे गांव मं? जइसे चोर बदमास मन ले जनता ला बचाय खातिर पुलिस अउ थाना के बेवसथा करे हें वइसने खेत के फसल ला मवेशी ले बचाय खातिर कांजी हाउस अउ रखवार(सुरक्षा कर्मी) के बेवसथा करे जाथे|

असाढ़ के महिना शुरू का होथे माल-मवेशी मन के पदनी-पाद पदोना शुरू हो जथे| एकर पहिली ओमन हर-हिंछा निसफिकर होके छेहेल्ला किंजरत, घुमत-फिरत रहिथे, चारा चरत-फिरत रहिथें| गरमी के महिना रहिथे, जेने मेर के तेने मेर बइठे रहिथें| कोनो बंदिस नइ रहाय, कोनो देखइया अउ हियाव करइया नइ रहाय| मवेशी घर, कोठा, बियारा मं आय हे के नइ आय हे, पैरा-चारा खाए हे, पानी पियें हे तेकर कोनो ला कांही चिंता नइ रहाय| बइला, बछरू, गाय सब ले निसफिकर रहिथें| खेत मं हे तो खेते मं हे, दइहान मं हे तब दइहाने मं हे| फेर हां, जउन दुधारू गाय, भइस रहिथें तेकर चिंता-फिकर घर गोसइयां अउ गोसइन मन जरूर करथे| ओमन कहूं भी रहिथे ओला खोज के ले आनथे, काबर के दूध के सवाल रहिथे बाकी जानवर बेवारस असन लाड़ा-बहेरा कस बिन दाई ददा के एती ओती भटकत रहिथें| ए मवेशी मन जिहें रहिथे तिहें चारा चरत, तरिया, नरवा अउ डोंगरी मं पानी पियत परे रहिथे|

बरसात के महिना जइसे शुरू होथे तहां ले एकर मन के मुसीबत बढ़ जथे| खेती किसानी के काम शुरू हो जथे| किसान चौकस हो जथे| धान बोवई शुरू हो जथे| तब किसान अपन-अपन मवेशी के हियाव करना शुरू कर देथे| बइला, भइसा जइसे पहली बेवारस असन घुमत-फिरत, चरत रहिथें तइसन ओमन नइ मिलय| किसान अपन-अपन कोठा मं लाके एमन ला चारा, पानी, दाना, भूसा खिलाना पिलाना शुरू कर देथे| काबर के नांगर जोताई के काम शुरू करना रहिथे| खोजे ले झन परय कहिके बराबर हियाव करत रहिथे| मवेशी के मालिक मन होथे बहुत चतुरा, जहां धान बोवई के काम सिरा जथे तहां ले मवेशी मन ला दिन होवय चाहे रात ढिल्ला छोड़ देथे| हरियर चारा के लालच मं मवेशी मन जिहां नहीं तिहां खेत मं चारा के लालच मं बगर जथे अउ जतका हरियर चारा रहिथे चाहे खेत होवे चाहे बाहिर पार सब ला चर-चर के नास कर देथे|

किसान के आंखी तभे उघरथे जब ओकर खुद के फसल के नुकसान हो जथे| ओहर हल्ला मचाना शुरु कर देथे, पंचायत मं सिकायत करथे अउ जगह-जगह अपन दुःख ला गोहरावत रहिथे| फसल ला बचाय खातिर कुछ उपाय करे जाय नइते अइसन मं हमन बरबाद हो जाबों| ए समय ओ किसान अपन गलती ला नइ देखे के मैं का करे हौं? काबर अपन मवेशी ला ढिल्ला छोड़े हौं येहर मोर नहीं ते कोनो दुसर किसान भाई के खेत ला चरही, ओकर फसल ला बरबाद करही| अपन खेत के नुकसान होथे तब जीव हर कइसे करलाय असन लगथे अउ तब कुछ बेवसथा करौ, माल मवेशी मन के, रोका छेका करौ| किसान फसल के चरी अउ चोरी ये दूनो बात ला लेके भारी परेशान रहिथे| फेर किसान तो किसान हे कहिथे कुछु, अउ करथे कुछु| जउन दिन एमन चेतलग हो जहीं , समझदार हो जहीं, परोसी के खेत अउ फसल ला अपने बेटी बहु बाई कस समझही ओ दिन नुकसान होना बंद हो जही|

बहुत रद्दी अउ गलत आदत हे गांव वाले मन के| चाहे छोटे होवय चाहे बड़े, जेन ला देखबे तउन सब के माल-मवेशी ढिल्ले दिखथे, बेफिकर होके छोड़ देथे| सब ये जरूर कहिथें के रोका-छेका होना चाही फेर ओ नियम के पालन करय कोनो नहीं| कहिथे कुछु करथे कुछु| नियत ककरो साफ़ नइ रहाय| बढ़ अनदेखना होथे| खड़े खड़े घला दुसर के खेत के फसल ला चरा देय मं ओकर मन के जीव नइ कसकय| अतेक हतियारा अउ बेइमान होय के घला सिकायत मिलत रहिथे| अपन फसल के ओमन ला बहुत दरद रहिथे, सोग रहिथे अतके समझ दुसरो किसान भाई मन बर होतीस तो सब लबा-लब हो जतिन| फेर अपने-अपन एक दुसर ला देख के जलत रहिथे, अइठत रहिथें|

अभी छत्तीसगढ़ मं जउन सरकार बने हे तेकर मुखिया किसान के बेटा हे| ओहर बने ढंग ले जानत हे किसानी के रकम ला, किसान मन के दुःख पीरा ला| अउ किसान मन के चालाकी ला घला| फसल चरी अउ चोरी के दुःख ला समझत हे ओहर| इही पाके कोनो परकार के नुकसान झन होवय, सोच के रोका छेका अभियान शुरू करे हे| सुनब मं आवत हे के उहू मं कतको झन राजनीति खोजे ले धर ले हे| कहिथे-खेती किसानी, माल-मवेशी किसान मन के मामला हे| ओला देखना, ओकर हियाव करना ओकर मन के बूता हे भाई| ओमन देखय, हियाव करय, रोका छेका करय अपन मवेशी मन ला| गांव के बेवसथा ला खुद संभालय इकरे खातिर तो पंचायत अउ ग्राम सभा बनाय गे हे| ओ बूता ल ओमन करय धरय| माल मवेशी ला संभलय| अपन घर, अपन गांव, अपन खेत के हियाव नइ कर सकही तब ओ कोन काम के किसान हे| सरकारे हर कतेक ला संभालही, का-का ला देखही? जब तक किसान ईमानदार, नीयत के साफ़ नइ होही, तब तक चोरी-चरी होवत रइही| तब न किसान के विकास हो पाही अउ न गांव के| ईमानदारी सब ले पहिली जरूरी हे|

गांव मं रोका-छेका

छत्तीसगढ़ सरकार के नरवा, गरवा, घुरवा योजना हा कतका अकन सफल होय हे तेला तो गांव वाले किसान भाई मन बता सकत हें, फेर सरकार दुसर योजना सही एकर सफल होय के ढिंढोरा तो पिटत हे| वइसने गोबर बेचे के घला योजना शुरू करे हे| शुरू मं तो सब हांसिन के ये सरकार हा का अतेक गिरगे हे के अब ओहर गोबर बेचही? का एकर करा अउ दुसर कोनो काम अउ योजना नइहे? हंसइया मन के मुंह ला तो कोनो तोप(रोक) नइ सकय| ओमन तो बने काम करही तभो हांसही, गिनहा करही तभो|

अब रोका छेका नवा अभियान शुरू करे हें| कतको झन के तो खोपड़ी मं नइ घुसत हे ये रोका छेका का बात हे, बला हे? अब जउन गांव संस्कृति मं पले, ढले अउ बढ़े नइहे, शहरिया डिंग मारत रइहीं तउन एला का समझही के ये का योजना अउ अभियान हे? छत्तीसगढ़ के मुखिया भूपेश बघेल गांव मं पले, ढले अउ बढ़े हे, खेले कूदे हे तब ओहर जानत हे, समझत हे के का-का उदिम होथे गांव मं? जइसे चोर बदमास मन ले जनता ला बचाय खातिर पुलिस अउ थाना के बेवसथा करे हें वइसने खेत के फसल ला मवेशी ले बचाय खातिर कांजी हाउस अउ रखवार(सुरक्षा कर्मी) के बेवसथा करे जाथे|

असाढ़ के महिना शुरू का होथे माल-मवेशी मन के पदनी-पाद पदोना शुरु हो जथे| एकर पहिली ओमन हर-हिंछा निसफिकर होके छेहेल्ला किंजरत, घुमत-फिरत रहिथे, चारा चरत-फिरत रहिथें| गरमी के महिना रहिथे, जेने मेर के तेने मेर बइठे रहिथें| कोनो बंदिस नइ रहाय, कोनो देखइया अउ हियाव करइया नइ रहाय| मवेशी घर, कोठा, बियारा मं आय हे के नइ आय हे, पैरा-चारा खाए हे, पानी पियें हे तेकर कोनो ला कांही चिंता नइ रहाय| बइला, बछरू, गाय सब ले निसफिकर रहिथें| खेत मं हे तो खेते मं हे, दइहान मं हे तब दइहाने मं हे| फेर हां, जउन दुधारू गाय, भइस रहिथें तेकर चिंता-फिकर घर गोसइयां अउ गोसइन मन जरूर करथे| ओमन कहूं भी रहिथे ओला खोज के ले आनथे, काबर के दूध के सवाल रहिथे बाकी जानवर बेवारस असन लाड़ा-बहेरा कस बिन दाई ददा के एती ओती भटकत रहिथें| ए मवेशी मन जिहें रहिथे तिहें चारा चरत, तरिया, नरवा अउ डोंगरी मं पानी पियत परे रहिथे|

बरसात के महिना जइसे शुरू होथे तहां ले एकर मन के मुसीबत बढ़ जथे| खेती किसानी के काम शुरू हो जथे| किसान चौकस हो जथे| धान बोवई शुरू हो जथे| तब किसान अपन-अपन मवेशी के हियाव करना शुरू कर देथे| बइला, भइसा जइसे पहली बेवारस असन घुमत-फिरत, चरत रहिथें तइसन ओमन नइ मिलय| किसान अपन-अपन कोठा मं लाके एमन ला चारा, पानी, दाना, भूसा खिलाना पिलाना शुरू कर देथे| काबर के नांगर जोताई के काम शुरू करना रहिथे| खोजे ले झन परय कहिके बराबर हियाव करत रहिथे| मवेशी के मालिक मन होथे बहुत चतुरा, जहां धान बोवई के काम सिरा जथे तहां ले मवेशी मन ला दिन होवय चाहे रात ढिल्ला छोड़ देथे| हरियर चारा के लालच मं मवेशी मन जिहां नहीं तिहां खेत मं चारा के लालच मं बगर जथे अउ जतका हरियर चारा रहिथे चाहे खेत होवे चाहे बाहिर पार सब ला चर-चर के नास कर देथे|

किसान के आंखी तभे उघरथे जब ओकर खुद के फसल के नुकसान हो जथे| ओहर हल्ला मचाना शुरु कर देथे, पंचायत मं सिकायत करथे अउ जगह-जगह अपन दुःख ला गोहरावत रहिथे| फसल ला बचाय खातिर कुछ उपाय करे जाय नइते अइसन मं हमन बरबाद हो जाबों| ए समय ओ किसान अपन गलती ला नइ देखे के मैं का करे हौं? काबर अपन मवेशी ला ढिल्ला छोड़े हौं येहर मोर नहीं ते कोनो दुसर किसान भाई के खेत ला चरही, ओकर फसल ला बरबाद करही| अपन खेत के नुकसान होथे तब जीव हर कइसे करलाय असन लगथे अउ तब कुछ बेवसथा करौ, माल मवेशी मन के, रोका छेका करौ| किसान फसल के चरी अउ चोरी ये दूनो बात ला लेके भारी परेशान रहिथे| फेर किसान तो किसान हे कहिथे कुछु, अउ करथे कुछु| जउन दिन एमन चेतलग हो जहीं , समझदार हो जहीं, परोसी के खेत अउ फसल ला अपने बेटी बहु बाई कस समझही ओ दिन नुकसान होना बंद हो जही|

बहुत रद्दी अउ गलत आदत हे गांव वाले मन के| चाहे छोटे होवय चाहे बड़े, जेन ला देखबे तउन सब के माल-मवेशी ढिल्ले दिखथे, बेफिकर होके छोड़ देथे| सब ये जरूर कहिथें के रोका-छेका होना चाही फेर ओ नियम के पालन करय कोनो नहीं| कहिथे कुछु करथे कुछु| नियत ककरो साफ़ नइ रहाय| बढ़ अनदेखना होथे| खड़े खड़े घला दुसर के खेत के फसल ला चरा देय मं ओकर मन के जीव नइ कसकय| अतेक हतियारा अउ बेइमान होय के घला सिकायत मिलत रहिथे| अपन फसल के ओमन ला बहुत दरद रहिथे, सोग रहिथे अतके समझ दुसरो किसान भाई मन बर होतीस तो सब लबा-लब हो जतिन| फेर अपने-अपन एक दुसर ला देख के जलत रहिथे, अइठत रहिथें|

अभी छत्तीसगढ़ मं जउन सरकार बने हे तेकर मुखिया किसान के बेटा हे| ओहर बने ढंग ले जानत हे किसानी के रकम ला, किसान मन के दुःख पीरा ला| अउ किसान मन के चालाकी ला घला| फसल चरी अउ चोरी के दुःख ला समझत हे ओहर| इही पाके कोनो परकार के नुकसान झन होवय, सोच के रोका छेका अभियान शुरू करे हे| सुनब मं आवत हे के उहू मं कतको झन राजनीति खोजे ले धर ले हे| कहिथे-खेती किसानी, माल-मवेशी किसान मन के मामला हे| ओला देखना, ओकर हियाव करना ओकर मन के बूता हे भाई| ओमन देखय, हियाव करय, रोका छेका करय अपन मवेशी मन ला| गांव के बेवसथा ला खुद संभालय इकरे खातिर तो पंचायत अउ ग्राम सभा बनाय गे हे| ओ बूता ल ओमन करय धरय| माल मवेशी ला संभलय| अपन घर, अपन गांव, अपन खेत के हियाव नइ कर सकही तब ओ कोन काम के किसान हे| सरकारे हर कतेक ला संभालही, का-का ला देखही? जब तक किसान ईमानदार, नीयत के साफ़ नइ होही, तब तक चोरी-चरी होवत रइही| तब न किसान के विकास हो पाही अउ न गांव के| ईमानदारी सब ले पहिली जरूरी हे|

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