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Saturday, November 27, 2021

Kinnaur Landslide: पहाड़ों में बढ़ते हादसों पर बोले पर्यावरणविद, चार महीने सबसे खतरनाक, पुरानी हिदायतें भूल रहे लोग  

नई दिल्‍ली. हिमाचल प्रदेश (Himachal Pradesh) के किन्‍नौर जिले के निगुलसरी में हुए हादसे ने एक बार फिर जख्‍म हरे कर दिए हैं. पहाड़ों में आए दिन आ रही आपदाओं के कारण सैकड़ों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ रही है. पिछले महीने से अब तक देखें तो हिमाचल में ही आधा दर्जन छोटे-बड़े मामले चट्टान गिरने या भूस्‍खलन (Landslide) के सामने आए हैं. इन घटनाओं पर पर्यावरणविदों का कहना है कि प्राकृतिक आपदा होने के साथ ही इसमें मानवीय भूल का भी अहम योगदान है.

यूसेक (उत्‍तराखंड स्‍पेस एप्लिकेशन सेंटर) के डायरेक्‍टर और जाने माने पर्यावरणविद, वैज्ञानिक महेंद्र प्रताप सिंह बिष्‍ट ने न्‍यूज18 हिंदी से बातचीत में कहा कि पहाड़ों में पिछले कुछ दिनों से लगातार हादसों की सूचनाएं मिल रही हैं. इसमें जनहानि और मालहानि दोनों ही हो रही है. ऐसा होना संभव भी है क्‍योंकि पहाड़ हो या कोई भी ऐसी जगह जहां प्रकृति (Nature) अपनी जटिल संरचना में है, वहां बरसात के चार महीने जिन्‍हें हमारे बुजुर्ग चौमासा बोलते थे, काफी खतरे भरे रहते हैं.

बिष्‍ट कहते हैं कि वैज्ञानिक रूप से देखें तो बरसात के मौसम की एक प्राकृतिक प्रक्रिया है कि पहाड़ (Mountain) का क्षेत्र जो इतने दिनों से सूखा हुआ था बारिश के बाद वहां तरावट या नमी आ जाती है. वहीं जरूरत से ज्‍यादा नमी आने पर वह बहने लगता है. ऐसे में पहाड़ी मुहानों पर सैकड़ों-हजारों सालों से जमी हुई मिट्टी, धूल, पत्‍थर और मलबे में ज्‍यादा पानी आने से या ओवर सेचुरेशन होने और मिट्टी के अंदर पानी का दवाब पैदा होने से चट्टान या पहाड़ का मलबा टूटकर या ढहकर गिरने लगता है.

किन्नौर में सेना के जवान लापता लोगों की तलाश कर रहे हैं.

किन्नौर में सेना के जवान लापता लोगों की तलाश कर रहे हैं.

इसके अलावा पहाड़ों में सामूहिक रूप से लोगों का आना-जाना भी पहाड़ी क्षेत्र में इस विचलन को बढ़ाता है. बारिश से नमी प्राप्‍त और गीली हुई मिट्टी के आसपास गाड़‍ियों की आवाजाही से भी भूस्‍खलन जैसी घटनाओं को घटने के लिए बल मिलता है.

पहाड़ में जाने के लिए क्‍यों खतरनाक हैं चार महीने

हिंदी महीनों में आषाढ़ से लेकर आश्विन तक बरसात के महीने रहते हैं जो कि जून आखिर से सितंबर तक चलते हैं. ऐसा नहीं है कि पहाड़ों में पहले भूसखलन या चट्टानें गिरने की घटनाएं नहीं हुईं लेकिन प्राचीन समय से ही पहाड़ों में रहने वाले लोग इन महीनों को लेकर काफी सतर्क रहते हैं. पुराने समय से चली आ रही हिदायतों पर आज भी अमल करते हैं. मौसम से लेकर प्रकृति के बदलावों पर नजर रखते हैं.

जबकि अभी देखा जा रहा है कि पहाड़ों में सभी जगहों से लोग किसी भी मौसम या कहें कि बरसात (Rain) के इन चार महीनों में भी जा रहे हैं जो कि हादसों के लिहाज से काफी संवेदनशील हैं. इन लोगों के पास न पूरी जानकारी होती है और न ही सुरक्षा के पूरे इंतजाम. वहीं पहाड़ों में रहने वाले लोग भी बुजुर्गों की कही गई पुरानी सीखों और हिदायतों को नजरअंदाज करने लगे हैं. जिसकी वजह से किसी भी घटना के समय भीषण स्थिति पैदा हो जाती है.

बरसात के महीनों में ही सबसे ज्‍यादा हादसे

.11 अगस्‍त 2021 को हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में निगुलसरी में हुए लैंडस्लाइड में 15 शव निकाले जा चुके हैं और करीब 19 लोगों को बचाया जा चुका है. अभी भी बचाव कार्य चल रहा है.

. हाल ही में 27 जुलाई 2021 को किन्‍नौर के बटसेरी में हादसा हुआ जिसमें 9 लोगों की मौत हो गई थी. इस दौरान एक पुल भी टूट गया था.

12 जुलाई 2021 : कांगड़ा जिले के शाहपुर के रुलेहड़ गांव में भूस्खलन से 10 लोगों की मौत

. 16 जुलाई 2019 में सोलन के कुम्हारहट्टी में भूस्खलन के कारण एक रेस्टोरेंट पूरी तरह उजड़ गया था. इस हादसे में असम रेजीमेंट के 13 जवानों की मौत हो गई थी, जबकि एक सिविलियन ने भी दम तोड़ दिया था.

13 अगस्‍त 2017 को पठानकोट-मनाली राष्‍ट्रीय राजमार्ग पर कोटरोपी के पास भूस्‍खलन हुआ. जिसमें एक बस मलबे में दब गई और 48 यात्रियों की मौत हो गई.

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ITBP के जवानों के सामने सबसे बड़ी समस्या पहाड़ से लगातार गिरते पत्थर हैं.

. 23 जुलाई 2015 को चट्टान गिरने से बस अनियंत्रित होकर पार्वती नदी में गिरी, 23 लोगों की मौत हुई थी.

. 18 अगस्त 2015 को मणिकर्ण के ऐतिहासिक गुरुद्वारा में चट्टान गिर गई थी जिसमें आठ की मौत हुई थी.

. 18 अगस्त 2010 को मंडी जिले के बल्ह के हटनाला में भूस्खलन से एक ट्रक खाई में गिरा, जिसमें 45 लोगों की मौत हो गई.

लोगों को जान की कीमत समझने की जरूरत

बिष्‍ट कहते हैं कि इस वक्‍त जब कि कोरोना महामारी का खतरा लगातार सर पर है वहीं बरसात का मौसम चल रहा है तो लोगों को सब्र रखने की जरूरत है. कोविड की दूसरी लहर में हुई तबाही देखने के बाद अचानक हिमाचल प्रदेश और उत्‍तराखंड में बढ़ी सैलानियों की संख्‍या आश्‍चर्यचकित करती है. आखिर लोग प्रकृति के स्‍वरूप और अपनी जान की कीमत कब समझेंगे. खिलबाड़ की यह प्रकृति लोगों का नुकसान ही करेगी. इसके लिए सरकारों को भी चाहिए कि वे पाबंदियां कड़ी करें.

आग की तरह फैलते हैं घटना के वीडियो लेकिन हिदायत क्‍यों नहीं

प्रो. बिष्‍ट कहते हैं कि आज अगर कोई घटना होती है तो उसके वीडियो मिनट के अंदर पूरे देश में फैल जाते हैं लेकिन जरूरी बातों, एहतियात संबंधी जानकारियां और कहीं भी जाने से पहले वहां की जलवायु के बारे में जानने की जरूरत जैसी जानकारियां क्‍यों नहीं फैल पातीं. सबसे खराब बात है कि लोग घटनाओं के बारे में घंटों में जानने के बाद उन्‍हें घंटों में ही भूल भी जाते हैं. यह ढर्रा प्रकृति के साथ-साथ मनुष्‍यों का भी नुकसान कर रहा है.

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