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Monday, November 29, 2021

पुलिस हिरासत में हर दिन 5 मौत, कई लापता- CJI रमन्ना ने यूं ही नहीं जताई थानों को लेकर चिंता

नई दिल्ली. चीफ जस्टिस एनवी रमना (CJI NV Ramana) ने रविवार को कहा कि पुलिस हिरासत में प्रताड़ना और अन्य पुलिसिया अत्याचार अभी भी प्रचलित हैं और यहां तक कि विशेषाधिकार प्राप्त लोगों को भी थर्ड डिग्री से बख्शा नहीं जाता है. चीफ जस्टिस ने कहा कि मानवाधिकारों और शारीरिक अखंडता को सबसे अधिक खतरा पुलिस स्टेशनों (Police Thana) में है. उन्होंने कहा कि पुलिस की ज्यादतियों को रोकने के लिए आगे का रास्ता “कानूनी सहायता के संवैधानिक अधिकार और मुफ्त कानूनी सहायता सेवाओं की उपलब्धता के बारे में जानकारी का प्रसार करना है.” चीफ जस्टिस की टिप्पणी के बाद ये जानना जरूरी है कि थानों की हालत क्या है और आंकड़े क्या कहते हैं. आखिर किन परिस्थितियों में चीफ जस्टिस ने यह कहा है. ये जानना जरूरी है.

पुलिस हिरासत में प्रतिदिन 5 मौतें

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के मुताबिक 2021 के पहले पांच महीनों में 1,067 लोगों की पुलिस हिरासत में मौत हुई है. इनमें भी सबसे ज्यादा 263 मौतें फरवरी में हुई हैं, जबकि पुलिस हिरासत में मौत के मामले सबसे ज्यादा मार्च में दर्ज किए गए हैं. बिहार में पुलिस हिरासत में एक व्यक्ति की मौत के बाद भीड़ के आक्रोश और एक पुलिस कांस्टेबल की मौत के बाद सरकार ने लोकसभा को बताया कि पिछले तीन सालों में देश के तमाम हिस्सों में 348 लोगों की पुलिस कस्टडी में मौत हुई है. मार्च 2020 तक के दशक को देखें तो कम से कम 17,146 लोगों की न्यायिक या पुलिस हिरासत के दौरान मौत के मामले दर्ज किए गए हैं.

एक व्यक्ति को पुलिस द्वारा गिरफ्तार करने और उसे पुलिस स्टेशन लाना पुलिस कस्टडी कहलाता है, कानून के मुताबिक इसकी अवधि 24 घंटे से ज्यादा नहीं हो सकती. हालांकि मजिस्ट्रेट के आदेश के बाद पुलिस कस्टडी को 15 दिन तक बढ़ाया जा सकता है. न्यायिक हिरासत के अंतर्गत अंडरट्रायल और दोषी साबित मामले आते हैं. नेशनल कैंपेन अगेंस्ट टॉर्चर (NCAT) की एक रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस हिरासत में हुई 63 फीसदी मौतें गिरफ्तारी के 24 घंटे के अंदर हो जाती हैं. इससे पहले कि उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाए.

मुश्किल से होती है किसी पुलिसकर्मी के खिलाफ कार्रवाई

NCAT ने पाया कि 2004 और 2018 के बीच हिरासत में प्रताड़ना के आरोपी किसी भी पुलिसकर्मी को दोषी नहीं ठहराया गया. इस दौरान पुलिस कस्टडी में मौत या लोगों के गायब हो जाने के 500 मामले दर्ज किए गए हैं और 54 पुलिसकर्मियों को चार्जशीट किया गया. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के डाटा के मुताबिक 2017 में 33 पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया गया और 27 को चार्जशीट किया गया था.

हालांकि कुल 43 पुलिसकर्मी चार्जशीट हुए थे, लेकिन किसी को भी दोषी नहीं ठहराया गया. एनसीआरबी के 2019 के आंकड़ों के मुताबिक इस साल कुल 85 मामले पुलिस हिरासत के रिपोर्ट किए गए थे, लेकिन किसी भी पुलिसकर्मी को दोषी नहीं ठहराया गया. हालांकि गुजरात में 14 पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया गया और उनके खिलाफ चार्जशीट पेश हुई.

महिलाएं कहीं ज्यादा असुरक्षित

2017 में एक संसदीय पैनल ने उत्तर प्रदेश में पुलिस हिरासत में रेप के मामलों पर चिंता जताई थी. देश में पुलिस हिरासत में रेप के 90 फीसदी मामले यूपी से रिपोर्ट किए जाते हैं. 2013 के बाद एनसीआरबी की आधिकारिक वेबसाइट पर इस संबंध में कोई डाटा मौजूद नहीं है. ‘वुमन इन डिटेंशन एंड एक्सेस टू जस्टिस’ नाम की अपनी रिपोर्ट में संसदीय पैनल ने 2015 के डाटा का विश्लेषण किया था.

इस रिपोर्ट में पुलिस हिरासत में रेप के 95 मामले यूपी से थे. इसके बाद उत्तराखंड से दो मामले थे, जबकि आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल से एक-एक मामले थे. NCAT के मुताबिक 2019 में कम से कम चार महिलाओं की पुलिस हिरासत में मौत के मामले दर्ज किए गए हैं.

जाति भी है एक फैक्टर?

जेल से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक भारत में तीन में से दो कैदी (69 प्रतिशत) और अंडरट्रायल्स (65 फीसदी) अनसूचित जाति, अनसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग समुदाय से हैं. 2019 में NCAT ने पुलिस हिरासत में मौत के 125 मामलों को दर्ज किया था, इनमें 60 प्रतिशत मामले गरीब और हाशिए के समुदाय से जुड़े थे. इनमें 13 पीड़ित दलित और आदिवासी समुदाय से थे. वहीं 15 पीड़ित मुस्लिम समुदाय से थे.

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