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Tuesday, October 19, 2021

BJP को 2019-20 में चुनावी बॉन्ड से मिला 2555 करोड़ का चंदा, कांग्रेस को 318 करोड़: रिपोर्ट

नई दिल्ली. चुनाव आयोग के डेटा के मुताबिक बीजेपी को साल 2019-20 में इलेक्टोरल बॉन्ड (Electoral Bonds) के जरिए सबसे ज़्यादा 76 फीसदी चंदा मिला. साल 2019-20 में इस बॉन्ड के ज़रिए कुल 3,355 करोड़ का चंदा राजनीतिक पार्टियों को मिला. इसमें से बीजेपी के खाते में 2 हज़ार 555 करोड़ रुपये आए. हिसाब लगाया जाए तो पिछले वित्त वर्ष के मुकाबले बॉन्ड के जरिए चंदे में बीजेपी की झोली में 75 परसेंट का इजाफा हुआ. साल 2018-19 में बीजेपी को बॉन्ड के जरिए 1450 करोड़ का चंदा मिला था.

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए चंदे में सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को हुआ है. पिछले साल के मुकाबले कांग्रेस के चंदे में 17 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है. 2018-19 में कांग्रेस को चुनावी बांड से 383 करोड़ मिले थे, जबकि इस बार यानी 2019-20 में उन्हें 318 करोड़ का चंदा मिला है. यानी चुनावी बॉन्ड से चंदे में कांग्रेस की हिस्सेदारी में 9 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई.

बाक़ी पार्टियों को कितना मिला?

बाकी विपक्षी दलों की बात की जाए तो ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस को 100.46 करोड़, शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी को 29.25 करोड़, शिवसेना को 41 करोड़, DMK को 45 करोड़, लालू यादव की राष्ट्रीय जनता दल को 2.5 करोड़ और अरविंद केजरीवाल की आम आदमी ने पार्टी को18 करोड़ रुपये का चंदा मिला.

ये भी पढ़ें:- सिब्बल की डिनर पार्टी में विपक्षी नेताओं के साथ G-23 का जमावड़ा, गांधी परिवार के नेतृत्व पर उठाए सवाल

बीजेपी को दोगुने से अधिक

मार्च 2019 में समाप्त हुए वित्त वर्ष में भाजपा की आय उसके पांच प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में दोगुने से अधिक थी. अकेले बीजेपी ने मार्च 2020 तक 68 प्रतिशत इलेक्टोरल बॉन्ड बेचे हैं. हालांकि बॉन्ड आने से बहुत पहले से बीजेपी को ज्यादा चंदा मिलता रहा है. नरेंद्र मोदी की सरकार ने साल 2018 में इलेक्टोरल बॉन्ड की शुरुआत की थी.

क्या है बॉन्ड?

साल 2017-18 में इलेक्टोरल बॉन्ड की शुरुआत की गई थी. इसका मकसद है राजनीतिक दलों के चुनावी चंदे को पारदर्शी बनाना. इलेक्टोरल बॉन्ड का इस्तेमाल व्यक्तियों, संस्थाओं और संगठनों द्वारा राजनीतिक दलों को चंदा देने के लिए किया जा सकता है. ये बांड्स देश भर में चुनिंदा बैंकों में उपलब्ध होते हैं. चुनावी बॉन्ड खरीदने वालों के नाम गोपनीय रखा जाता है.

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