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Wednesday, October 20, 2021

अफगान शरणार्थी ने कहा- मैं वापस नहीं जाना चाहता, मेरा पेशा तालिबान के लिए है हराम

नई दिल्‍ली. जैसे-जैसे अफगानिस्‍तान (Afghanistan) में तालिबान (Taliban) का आक्रमण बढ़ता जा रहा है और अफगान सेना तालिबानी लड़ाकों ( Taliban Fighters) के हमलों के चलते अपने पैर पीछे खींचती जा रही है वैसे-वैसे अपनी मातृभूमि से हजारों किलोमीटर दूर रहने वाले शरणार्थियों की प्रतिक्षा कई और वर्षों या कहें कि शायद दशकों तक के लिए लंबी होती जा रही है.

दिल्‍ली के जंगपुरा में रहने वाले दाऊद शरीफी एक ऐसे ही शरणार्थी हैं जो पिछले सात साल से अधिक समय से भारत में रह रहे हैं. अफगानिस्‍तान और तालिबान के बीच जारी जंग को देखते हुए दाऊद शरीफी कहते हैं, “मैं हमेशा से अपने वतन लौटने की इच्छा रखता हूं लेकिन मेरे बच्चे जो इस देश (भारत) में पैदा हुए हैं, वे इसे कभी पसंद नहीं करेंगे. अफगानिस्तान में हर जगह हिंसा, युद्ध और यातनाएं हैं. अगर कोई भी वहां जाएगा तो मारा जाएगा.” शरीफी कहते हैं कि अफगानिस्‍तान और तालिबान के बीच जारी जंग को देखते हुए हजारों लोग उत्‍तरी अफगानिस्‍तान से चले गए हैं. उनके घर और गांव अब पूरी तरह से तबाह हो चुके हैं. हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि अफगान सेना अब तालिबान लड़ाकों को रोकने में विफल साबित हो रही है.

शरीफी, जो दिल्ली में अफगान शरणार्थी संघ के भी प्रमुख हैं, कहते हैं कि अपने वतन के हालात को देखते हुए 30 हजार अफगान नागरिक भारत में शरण लेने की सोच रहे हैं. भारत उन देशों में से एक है जो अफगान शरणार्थियों को अपने यहां शरण देता है. भारत की तरह ही पाकिस्‍तान और ईरान भी अफगानिस्‍तान के नागरिकों को शरण देते आ रहे हैं. संयुक्‍त राष्‍ट्र शरणार्थी उच्‍चायुक्‍त कार्यालय (यूएनएचसीआर) ने एक रिपोर्ट के मुताबिक अफगानिस्तान में पिछले चार दशकों से जारी युद्ध ने 2.6 मिलियन से अधिक लोगों को शरणार्थी बना दिया है.

हालांकि कई गैर-सरकारी संगठन का मानना है कि शरणार्थियों की संख्‍या रिपोर्ट में पेश आंकड़ों से बहुत ज्‍यादा हो सकती है. एमनेस्टी इंटरनेशनल ने अफगान शरणार्थियों को दुनिया में सबसे बड़ी शरणार्थी आबादी बताया है. दिल्ली पिछले दो दशक अफगान शरणार्थियों का घर रहा है. पिछले दो दशक से अफगान शरणार्थी राष्ट्रीय राजधानी के लाजपत नगर, जंगपुरा, भोगल और पुरानी दिल्ली इलाके में बसने लगे थे.

इसे भी पढ़ें :- अफगानिस्तान में कहां तक जाएगी तालिबान की लड़ाई? पढ़ें News18 की ये रिपोर्ट

अफगानिस्‍तान के हालात को देखते हुए कई लोग वहां से भाग गए हैं लेकिन अबर फरहाद जैसे कुछ ऐसे भी लोग हैं जो तालिबान के हाथों हिंसा का जोखिम उठाने को तैयार हैं. फरहाद पिछले तीन दशकों से पेंटिंग कर रहे हैं और अफगानिस्तान में एक लोकप्रिय कलाकार रहे हैं. हालांकि तालिबान के आगे उन्‍होंने भी 2018 में अफगानिस्‍तान छोड़ दिया और भारत आ गए. फरहाद कहते हैं कि मैं अफगानिस्तान नहीं लौट सकता क्योंकि तालिबान पेंटिंग को हराम मानते हैं. उन्होंने इसे गैर-इस्लामिक करार दिया है. मैं देश वापस नहीं लौट सकता क्योंकि मेरा पेशा वहां स्वीकार नहीं किया जाएगा.

इसे भी पढ़ें :- पाकिस्तान में तालिबान की जगह कौन कर रहा है अफगान सरकार का समर्थन

रिपोर्टों से पता चलता है कि तालिबान इस्लामी प्रथाओं के आधार पर एक बहुत ही सख्‍त और रूढ़िवादी कानून बना रहा है जहां पर्दे के सख्त नियम होंगे. तालिबान की रूढिवादी प्रथाओं में मानव कला या पेंटिंग पर प्रतिबंध लगाया गया है. फरहाद उन पेंटिंग्स को दिखाते हैं जिन्हें वह अपनी मातृभूमि से लेकर आए हैं. इन पेंटिंग में प्रसिद्ध बामियान बुद्ध की मूर्ति और “द अफगान गर्ल” की एक पेंटिंग शामिल है. फरहाद की पेंटिंग उनके देश में काफी प्रसिद्ध थीं. यूनेस्को की ओर से निकाली गई एक किताब में अफगान कलाकारों का जिक्र है, जिसमें वह अपना नाम दिखाकर काफी गर्व महसूस करते हैं. उन्‍होंने कहा कि भले ही अफगानिस्तान में चल रही लड़ाई के दौरान भारत सबसे सुरक्षित देशों में हो लेकिन एक शरणार्थी के रूप में उनकी स्थिति हमेशा उन्‍हें परेशान करती रहेगी.

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