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Wednesday, January 19, 2022

Coronavirus Vaccination: भारत में क्या है कोरोना वैक्सीनेशन का हाल? कैसे मिलेगा सभी को टीका

नई दिल्ली. कोरोना वायरस (Coronavirus) ने दुनिया के तमाम हिस्सों में तबाही मचा रखी है, खासतौर पर इसके डेल्टा वेरिएंट (Covid-19 Delta Variant) ने, जिसके चलते कई देशों में संक्रमण की नई लहर ने वैश्विक समुदाय को अपनी चपेट में ले रखा है. इस महामारी से निपटने के लिए वैज्ञानिक समुदाय ने बड़ी तेजी से वैक्सीन का विकास किया और यह संक्रमण के खिलाफ एकमात्र प्रभावी उपाय है. दुनिया भर में अभी तक 19 वैक्सीन को टीकाकरण के लिए मंजूरी दी जा चुकी है.

इन वैक्सीन का निर्माण सघन वैज्ञानिक और इंडस्ट्री सहयोग के साथ मिलकर किया गया है. कई सरकारों ने इसमें आर्थिक मदद भी की है, लेकिन हालात ये है कि टीकाकरण में अमीर और गरीब की खाई बढ़ती जा रही है. दुनिया के विकसित और अविकसित देशों में टीकाकरण कार्यक्रमों में काफी अंतर हैं, वहीं वैक्सीन के प्रकारों को लेकर वर्गीकरण देखने को मिल रहा है. टीकाकरण कार्यक्रम के लिए वैक्सीन की उपलब्धता और वितरण के साथ उसके प्रकारों में अंतर चिंता बढ़ाने वाला है.

अपनी भूमिका निभाने में असफल रहा कोवॉक्स?

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की अगुवाई वाला कोवॉक्स गठबंधन निम्न और मध्य आय देशों के लिए वैक्सीन खरीदने और वितरण करने में नाकाम रहा है. पश्चिमी देशों और संसाधनों से परिपूर्ण देशों ने टीकाकरण के लिए mRNA आधारित वैक्सीन या ऐस्ट्राजेनेका (Astrazeneca) और जॉनसन एंड जॉनसन (Johnson and Johnson) की वायरल वेक्टर वैक्सीन के उपयोग को मंजूरी दी है. वहीं, निम्न और मध्य आय देश वाले देश टीकाकरण के लिए चीन और रूस की वैक्सीन पर निर्भर हैं.

अभी तक दुनिया भर में वैक्सीन के 4.1 बिलियन टीके लोगों को दिए गए हैं. चीन (1.61 बिलियन), भारत (455 मिलियन) और अमेरिका (344 मिलियन) सबसे ज्यादा टीकाकरण करने वाले शीर्ष देशों में शामिल हैं, जोकि वैश्विक टीकाकरण में 50 फीसदी से भी ज्यादा का योगदान रखते हैं.

ज्यादातर विकसित देशों ने वायरस संक्रमण के खिलाफ अपनी आधी आबादी को टीका लगा दिया है. वहीं गरीब देशों में अभी तक टीकाकरण शुरू भी नहीं हो पाया है. समय की मांग है कि वैक्सीन की आपूर्ति और मांग के बीच के अंतर को पाटा जाए. स्पष्ट है कि हमें और ज्यादा वैक्सीन चाहिए लेकिन ये कहां से आएंगी.

दुनिया भर में 120 से ज्यादा वैक्सीन पर काम

अभी तक मंजूरी प्राप्त 19 कोविड वैक्सीन में ज्यादा चीन में निर्मित और मान्यता प्राप्त है. वहीं क्यूबा, ईरान, तुर्की और कजाखस्तान जैसे विकासशील देशों ने भी अपनी वैक्सीन विकसित की है. इसके अलावा 30 वैक्सीन का ट्रायल चल रहा है और कुछ को इमरजेंसी इस्तेमाल के लिए मंजूरी का इंतजार है. दूसरी ओर 90 से ज्यादा वैक्सीन फेज-1 और फेज-2 ट्रायल के दौर में हैं. इस तरह दुनिया भर में 120 से ज्यादा वैक्सीन पर काम हो रहा है.

तथ्य ये है कि दुनिया वैक्सीन की कमी से जूझ रही है. हालांकि कंपनियों ने टीके का उत्पादन बढ़ाने की कोशिश की है और कई जगहों पर उत्पादन चल रहा है. जैसेकि फाइजर अफ्रीकी देशों के लिए दक्षिण अफ्रीका में वैक्सीन का उत्पादन शुरू करने की घोषणा की है. वहीं सबसे सस्ती वैक्सीन कही जाने वाली ऐस्ट्राजेनेका की वैक्सीन का इस्तेमाल 100 से ज्यादा देशों में हो रहा है और कई देशों में इसका उत्पादन भी चल रहा है.

हालांकि नई वैक्सीन के लिए कुछ अतिरिक्त चुनौतियां भी हैं. जैसेकि पहले विकसित हुई वैक्सीन को कोरोना के मूल स्वरूप के खिलाफ टेस्ट किया गया था, लेकिन नई वैक्सीन के फेज-3 का ट्रायल कोरोना के कई नए स्वरूपों और ज्यादा संक्रामक स्ट्रेन के खिलाफ भी करना होगा.

ऐसे में फेज-3 का ट्रायल आयोजित करना अब ज्यादा चुनौतीपूर्ण होगा, खासतौर पर उन देशों में ज्यादा एक बड़ी आबादी का टीकाकरण हो गया है. साथ ही प्रभावी वैक्सीन उपलब्ध होने की स्थिति में प्लेसिबो कंट्रोल ग्रुप के जरिए फेज-3 का ट्रायल भी नैतिक रूप से सही नहीं कहा जा सकता है.

बिना इंजेक्शन वाली वैक्सीन

कोरोना की नई वैक्सीन ऊंचे तापमान की चुनौतियों को हैंडल कर सकती हैं, जोकि गरीब देशों के लिए एक बड़ी समस्या है. इंजेक्शन के जरिए टीकाकरण हमेशा से कठिन रहा है और लोगों में इसे लेकर सहजता भी नहीं रही है. इंजेक्शन के इस्तेमाल के बदले नाक या मुंह के जरिए टीकाकरण आने वाले दिनों में एक आकर्षक लक्ष्य हो सकता है. भारत सहित कई देशों में बिना इंजेक्शन वाली वैक्सीन पर काम चल रहा है.

नई वैक्सीन के विकास में सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण नोवावैक्स की वैक्सीन है, जोकि प्रोटीन आधारित है और यह 91.4 फीसदी प्रभावी है. इस वैक्सीन का ट्रायल तब किया गया, जब कोरोना के कई नए खतरनाक स्वरूप सामने आ रहे थे. हालांकि अमेरिकी नियामक संस्था ने इस वैक्सीन को अपनी मंजूरी नहीं दी है.

एक और प्रोटीन आधारित वैक्सीन का विकास भारत में बॉयोलॉजिकल ई (Biological E) कर रही है, जिसका अमेरिका के बेलर कॉलेज और मेडिसिन के साथ समझौता है. अभी तक हुए ह्यूमन ट्रायल में वैक्सीन ने शानदार नतीजे दिए हैं. इस तरह की वैक्सीन कोरोना टीकाकरण के लिए गेमचेंजर हो सकती है, जोकि ना केवल सुरक्षित और प्रभावी हैं, बल्कि टाइम टेस्टेड भी हैं और इन्हें ऊंचे तापमान पर स्टोर किया जा सकता है. आम तौर पर इस तरह की वैक्सीन सस्ती भी होती हैं.

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक जर्मनी की कंपनी क्यूरवॉक की mRNA आधारित वैक्सीन ट्रायल नतीजों में 47 प्रतिशत प्रतिरोधी पाई गई है, जोकि मानक के लिहाज से बहुत ही कम है और इसकी वजह से यूरोपीय यूनियन और अन्य देशों में टीकाकरण कार्यक्रम में इसकी भूमिका पर सवाल खड़े हो गए हैं. वैक्सीन के निराश करने वाले परिणाम ने नई वैक्सीन के विकास में मौजूद में रिस्क और चुनौतियों को भी रेखांकित किया है.

चीन ने अभी तक 6 से ज्यादा वैक्सीन को मंजूरी दी है और मध्य जून में उसने प्रतिदिन 2 करोड़ लोगों का टीकाकरण किया है. चीन ने अब खुद की बनाई वैक्सीन के जरिए नाबालिगों का भी टीकाकरण शुरू कर दिया है. हालांकि चीन की वैक्सीन को लेकर इंडोनेशिया और थाईलैंड जैसे कुछ एशियाई देशों ने चिंता जताई है.

भारत में टीकाकरण की स्थिति

भारत में वैक्सीन के 50 करोड़ टीके लोगों को दिए गए हैं. 21 जून को भारत में 90 लाख लोगों का एक दिन में टीकाकरण किया गया था. हालांकि टीकाकरण में ज्यादातर ऐस्ट्राजेनेका और सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की बनाई वैक्सीन कोविशील्ड का प्रयोग किया गया है. वहीं भारत बॉयोटेक और आईसीएमआर की वैक्सीन कोवॉक्सिन का प्रयोग सिर्फ 12 फीसदी रहा है. रूस की वैक्सीन स्पुतनिक-V का इस्तेमाल अभी भी बहुत ज्यादा नहीं है.

टीकाकरण कार्यक्रम के संशोधित अनुमानों के मुताबिक दिसंबर 2021 तक भारत वैक्सीन के 135 करोड़ टीके खरीद सकता है. पिछले दो महीने में वैक्सीन की सप्लाई प्रतिदिन 4 लाख की रही है. साफ है कि आने वाले दिनों में वैक्सीन की सप्लाई मौजूदा दर के मुकाबले दोगुनी होनी चाहिए.

उम्मीद है कि आने वाले दिनों में कोविशील्ड और कोवॉक्सिन का उत्पादन बढ़ेगा. साथ ही स्पुतनिक-V वैक्सीन की सप्लाई भी आयात या भारत में उत्पादन के जरिए बढ़ाई जाएगी. इससे वैक्सीन सप्लाई में अंतर को पूरा करने में मदद मिलेगी.

भारत में वैक्सीन सप्लाई चेन के लिए नोवावैक्स और बायोलॉजिकल ई वैक्सीन को मंजूरी और निर्माण गेमचेंजर साबित हो सकता है. आने वाले दिनों में डीएनए आधारित जायडस कैडिला की वैक्सीन भी टीकाकरण के लिए उपयोग की जा सकती है. इस वैक्सीन की तीन खुराक लोगों को दी जाती है. इसके अलावा बायोलॉजिकल ई जॉनसन एंड जॉनसन की एक खुराक वाली वैक्सीन का निर्माण भी करने वाली है, जिसे भारत ने मंजूरी दे दी है.

अगर सभी चीजें सही रहीं तो भारत 2022 तक से 1 से 2 अरब वैक्सीन की खुराक खरीद सकता है. सस्ते दरों पर उच्च गुणवत्ता वाली वैक्सीन का निर्माण करने की क्षमता भारत के पास है. उम्मीद है कि आने वाले दिनों में भारत में सबसे बड़े वैक्सीन उत्पादक देश के रूप में अपनी छवि के साथ न्याय करेगा और खासतौर पर विकासशील देशों को वैक्सीन आपूर्ति सुनिश्चित करेगा.

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