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Friday, January 28, 2022

गोरखा सैनिकों की कमी से जूझ रही है भारतीय सेना, हर बटालियन में करीब 80 से 100 गोरखा की कमी

नई दिल्ली. गोरखा रेजिमेंट का इतिहास 200 साल पुराना है और जहां -जहां ये रेजिमेंट जाती है इसके बहादुरी के क़िस्से उसके आगे-आगे चलते हैं. और शायद ये दुनिया की इकलौती ऐसी रेजिमेंट है जो एक नहीं, दो नहीं, बल्कि तीन देशों की सेना में अपनी बहादुरी के परचम लहरा रही है. सबसे ज़्यादा गोरखा भारतीय सेना का हिस्सा हैं. उसके बाद नेपाल और फिर ब्रिटिश सेना में गोरखा शामिल हैं. ब्रिटिश और नेपाल की सेना में तो सिर्फ़ नेपाल के गोरखा ही भर्ती होते हैं, जबकि भारतीय सेना के इस रेजिमेंट में नेपाली गोरखा और भारतीय गुरखा दोनों शामिल हैं, लेकिन भारतीय सेना के लिए एक परेशानी पिछले दो-तीन साल से खड़ी हो रही है वो है भारतीय गोरखा की कमी.

नेपाल के गोरखा तो भारतीय सेना को आसानी से मिल रहे हैं, लेकिन भारतीय गोरखा की कमी से सेना जूझ रही है. भारतीय सेना के एक अधिकारी के मुताबिक़ आज़ादी से पहले तक गोरखा रेजिमेंट में करीब 90 फ़ीसदी गोरखा सैनिक नेपाल के होते थे और 10 फ़ीसदी भारतीय गोरखा, लेकिन जैसे-जैसे समय बीता इसका प्रतिशत पहले 80:20 और बाद में इसे 60:40 तक कर दिया गया. यानी की 60 फ़ीसदी नेपाली डोमेसाइल गोरखा और 40 फ़ीसदी भारतीय डोमेसाइल गोरखा.

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भारतीय सेना में आज की तारीख़ में नेपाल से तो गोरखा सैनिक पूरे मिल रहे हैं. इसमें कोई कमी दर्ज नहीं की गई है, लेकिन बाक़ी बचे भारतीय डोमेसाइल गोरखा के 40 फ़ीसदी में ज़बरदस्त कमी आई है. अगर इस कमी के आंकड़े की बात करें, तो कुल गोरखा की सात रेजिमेंट की 43 से ज़्यादा बटालियन है जिनमें 4500 भारतीय गोरखा की कमी यानी की एक अनुमान के तौर पर तक़रीबन 80 से 100 भारतीय गोरखा हर बटालियन में कम हो रहे हैं. भर्ती के दौरान 25 से 30 पर्सेंट ही गोरखा मिल पा रहे हैं और बाक़ी 10 से 15 फ़ीसदी कमी को पूरा करने के लिए भारतीय सेना ने हाल ही में गढ़वाल और कुमाऊँ के युवाओं को इस रेजिमेंट में भर्ती करना शुरू किया है.

आख़िर क्यों हो रही है ये कमी

भारतीय सेना में भारतीय गोरखा की कमी की सबसे बड़ी वजह ये है कि भारतीय गोरखा भर्ती के लिए आते तो हैं, लेकिन उन मापदंडों पर खरे नहीं उतर रहे हैं जो कि इस रेजिमेंट में शामिल होने के लिये तय किए गए हैं और भारतीय सेना ने पहले से ही तय किया है कि भर्ती के लिए तय किए गए मापदंडों में किसी भी तरह का बदलाव नहीं करेगी. भारतीय सेना ने नीति में ज़रूर बदलाव किया, लेकिन मापदंडों में नहीं. लिहाजा इस कमी को पूरा करने के लिए इस बार की भर्ती में छूट देते हुए कुमांऊ और गढ़वाली के युवाओं को मौक़ा दिया गया है और ये पहली बार है जब गोरखा रेजिमेंट में गोरखा के अलावा किसी और तबके के युवाओं को शामिल किया गया. दरअसल उत्तराखंड के कुमांऊ और गढ़वाल के युवकों की इसलिए भर्ती की जा रही है क्योंकि ये काफी हद तक गोरखा के समान हैं. इनके बीच रहन-सहन से लेकर खानपान में और भौगोलिक स्थितियों में काफी समानता है.

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सेना के एक अधिकारी के मुताबिक़ फ़िलहाल गोरखा 4 रेजिमेंटल सेंटर में इस वक्त 600 से ज़्यादा उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल के युवा ट्रेनिंग ले रहे हैं, अगर इस कमी की बात करें तो उसके पीछे की एक और वजह ये भी है कि अब भारतीय गोरखा जो पहले नौकरी के लिए फौज को एक बेहतर विकल्प के तौर पर देखते थे, समय बदलने के साथ-साथ उनके सामने नौकरी के कई और विकल्प खुल गए और उनका रुझान उस तरफ़ हो गया है.

आज़ादी के वक्त अंग्रेजों की स्थापित की गई गोरखा रेजिमेंट की कुल संख्या 10 थी, लेकिन आज़ादी के बाद जब सेना का बंटवारा हुआ तो 4 रेजिमेंट 2,6,7 और 10 ब्रिटिश ने अपने पास रखी, जबकि 6 रेजिमेंट 1, 3, 4, 5, 8 और 9 भारत के पास आई. आज़ादी के बाद भारतीय सेना ने गोरखा की एक और रेजिमेंट स्थापित की जिसे 11 गोरखा रेजिमेंट के नाम से जाना जाता है और ब्रिटिश के पास गए 4 में से एक रेजिमेंट डिसबैन हो गई. बहरहाल भारतीय सेना को इस बात की उम्मीद है कि आने वाले दिनों में भारतीय गोरखा की गोरखा रेजिमेंट में हो रही कमी दूर हो जाएगी.

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