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Friday, January 28, 2022

Opinion: अंतर्मुखी भारत अब मुखर भारत, पीएम मोदी की बदौलत देश बना दुनिया की जरूरत

अखिलेश मिश्रा

जो बाइडन अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति हैं जिनसे नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री के तौर पर मिल रहे हैं. इंदिरा गांधी के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही हैं जिन्हें ये मौका मिला है. लेकिन ये आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि इसी दौरान पहला व्यक्तिगत क्वाड शिखर सम्मेलन भी हो रहा है जो इतिहास में एक उल्लेखनीय अवसर है. वर्तमान की बात पर लौटने से पहले थोड़ा पिछले पन्नों पर संक्षिप्त में नज़र डाल लेते हैं. न्यू वर्ल्ड ऑर्डर यानि नई विश्व व्यवस्था बहुत ज्यादा इस्तेमाल होने वाला शब्द है हालांकि ये महज़ एक सदी पुराना है. इस शब्द का इस्तेमाल विशेषतौर पर युगों को परिभाषित करने के लिए किया जाता है, मजेदार बात ये है कि जिस दौर के बारे में बात की जाती है उस दौर में इस शब्द का इस्तेमाल नहीं होता था. लेकिन आज उस दौर को समझाने के लिए नई विश्व व्यवस्था शब्द का इस्तेमाल होता है. पिछले हज़ार सालों को वैश्विक रूप से हम दो विश्व व्यवस्थाओं में बांट सकते हैं. जिसमें दूसरी विश्व व्यवस्था में दो बदलाव दर्ज किए गए हैं.

पहली विश्व व्यवस्था ने पिछली सहस्राब्दी की शुरुआत में आकार लिया जब इस्लाम ने अरब प्रायद्वीप के बाहर जाकर अपने पैर जमाना शुरू किया. और भारतीय उपमहाद्वीप सहित बाद की कुछ सदियों में इंस्ताबुल में अपना असर फैलाया. दूसरी विश्व व्यवस्था का उत्थान यूरोप के उदय के साथ, पिछली सहस्राब्दी के मध्य में हुआ, जब औपनिवेशी साम्राज्य ने अपने पैर पसारना शुरू किए. दूसरी विश्व व्यवस्था के पहले चरण की बात करें तो हम इसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से वर्गीकृत कर सकते हैं. हालांकि कई यूरोकेंद्रित लेखक इसे पश्चिमी सामाजिक विकास कहते हैं जिसमें विश्व व्यवस्था दोबारा बदल कर यूरोप से अमेरिका की तरफ स्थानांन्तरित हुई.

भारत के परिप्रेक्ष्य में बात की जाए तो पिछले हजार सालो में देश ने अरब, मंगोल, तुर्क, फारस और अफगान के हमले झेले, हालांकि कोई भी आक्रांता पूरे भारत पर किसी निश्चित अवधि के लिए या पूरे भारत पर राज नहीं कर सका. सिर्फ ब्रिटिश उपनिवेश ने ही भारत के बड़े हिस्से पर राज किया हालांकि वह भी कभी भारत की संस्कृति पर कब्जा नहीं जमा सके. जबकि सभ्यता के इतिहास में झांके तो दूसरे उपनिवेशों पर वो अपना असर डालने में कामयाब रहे.

पिछले हजार सालों में भारत को लेकर एक बात थी जिसमें बदलाव हुआ. गुप्त साम्राज्य के दौरान और उसके आगे चोल, पल्लव तक भारत हमेशा अपनी सभ्यता में बंध कर नहीं रहे, भारत के राजाओं ने कभी भी खुद को अपनी परंपराओं तक सीमित नहीं रखा बल्कि भारतीय संस्कृति और जीवन जीने की पद्वति को भारत के पूर्व, दक्षिण और पश्चिम विशेषतौर पर समुद्री क्षेत्रों में विस्तार करने में कोई हिचक नहीं दिखाई. लेकिन पिछले हजार सालों में भारत की खुल कर संस्कृति को स्वीकारने ओर उदार रवैये में बदलाव आया है और भारत खुद में ही सिमट कर रहने वाला देश बन गया.

हालिया नजरिए से समझे तों भारत में विश्व व्यवस्था के दौरान दो बार बदलाव देखे गए है. पहला ठीक दूसरे विश्व युद्ध के बाद का दौर जब भारत को आजादी भी मिली थी. यह पुनर्व्यवस्था अभी भी पश्चिम प्रभावी थी. जवाहरलाल नेहरू इस पुनर्व्यवस्था की शुरुआत में प्रधानमंत्री थे. विश्व के साथ भारत की नीतियों के साथ जोड़ने के लिए उनके पास 17 साल का अच्छा समय था. इतने वक्त और परिस्थितियों के लिए उनके आलोचक उनकी आलोचना कर सकते हैं वहीं उनके समर्थक मानते हैं कि वह कुछ गलत नहीं कर सकते हैं. शायद एक नया स्वतंत्र राष्ट्र युद्ध के विजेता देशों के साथ आत्मविश्वास से जुड़ने के मामले में कमजोर था. शायद नेहरू आदर्शवाद के विचार से ज्यादा मोहित थे और उन्होंने इसे राष्ट्र हित के ऊपर रखा था. चाहे जो भी हो लेकिन इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि 1947 में जो क्लीन स्लेट मिली थी भारत उसका फायदा नहीं उठा सका. ऐसे बहुत कम अवसर आते हैं जब किसी को देश के रूप में एक ऐसी क्लीन स्लेट मिलती है जिसे वो जैसा चाहे रंग सकता है लेकिन उसे रंगने के बजाए पूरी स्लेट खराब कर दी गई. नेहरू ने जिन आर्थिक नीतियों का चुनाव किया उसकी वजह से धीरे-धीरे उनकी सभी नीतियों, जिसमें सामाजिक, घरेलू, राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय रिश्ते शामिल थे, सब पर असर डाला.

दूसरी पुनर्व्यवस्था बर्लिन की दीवार गिरने, सोवियत यूनियन के पतन और एक ध्रुवीय दुनिया के अनुमानित उद्भव के साथ हुई. नरसिम्हा राव अब देश के प्रधानमंत्री थे. उन्होंने आर्थिक सुधार तो किए लेकिन दबाव में आकर और जैसे ही संकट टला उन्होंने उसे रोक दिया. भारत की विदेश नीति के रुख को केलिब्रेट किया. प्रमुख पश्चिमी राज्यों में आतंकवाद को समाप्त किया तो दूसरे सीमावर्ती राज्यों में इसे पनपते और विकसित होते देखा. कुल मिलाकर व्यापक स्तर पर कुछ सुधारों के अलावा नरसिम्हा राव भी भारत के अंतर्मुखी शक्ति वाले रवैये को बदल नहीं सके. ये वो खूबी थी जो हमने पिछली सहस्राब्दी में हासिल की थी. भारत अभी भी अपने पड़ोंसियों के आक्रामक रवैये और महाशक्तियों के हस्तक्षेप का जवाब रक्षात्मक तरीके से दे रहा था.

अब जरा वर्तमान में पनप रही नई विश्व व्यवस्था पर लौटते हैं. जो शीत युद्ध के बाद की पुनर्व्यवस्था की ही पुनर्रावृत्ति होगी या फिर ये पूरी तरह से नई व्यवस्था होगी ये तो वक्त ही बताएगा. ये नई व्यवस्था पुरानी कई व्यवस्थाओं के विपरीत भारत को एक सुअवसर प्रदान करती है और इस नवजात नई व्यवस्था को आकार देने की भारत की क्षमता को प्रभावित करने वाली कई वजह हैं.

पहला : 1947 के इतर भारत अब एक आत्मविश्वास से भरा देश है जिसके पास 7 दशकों तक देश चलाने का अनुभव है, जो दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक हैं जहां एक बहुत बड़ा मध्यम वर्ग है जो वैश्विक संस्थानों के साथ जुड़ा हुआ है.

दूसरा : 1947 के इतर भारत के पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं जो भारत को मजबूत करने में संवेदनशील हैं. और प्रधानमंत्री का आवेग राष्ट्रीय आवेग और नई भारतीय पीढ़ी के अनुरूप है, जो अतीत की बेड़ियों को नहीं ढोता है और तकनीक से लेकर खेल के मैदान तक खुद दुनिया में सर्वश्रेष्ठ के बराबर मानता है.

तीसरा: 1990 के इतर भारत आर्थिक संक्ट के दौर में नहीं है, बल्कि भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक अहम कड़ी है. और 1990 की तरह भारत कोई भी आर्थिक सुधार दबाव में करने की स्थिति में नहीं है. प्रधानमंत्री मोदी का कहना है कि भारत में अब सुधार दृढ़ विश्वास से होता है मजबूरी के चलते नहीं. इस भरोसे ने भारत को बाजार में खुल कर आने की मजबूती प्रदान की है.

चौथा: 1947, 1990 में उत्पादन सबसे अहम पहलू था जो आर्थिक स्थिति को बढ़ावा देता. भारत ने 18वीं और 19वी सदी में औद्योगिक और उत्पादन क्रांति का लाभ नहीं उठाया. तीसरी पुनर्व्यवस्था या नई व्यवस्था का उद्भव पूरी तरह से डिजिटल क्रांति पर आधारित होगा और इस मामले में भारत ना सिर्फ सभी के बराबर है बल्कि कई मामलों में वो दुनिया का नेतृत्व संभालने की स्थिति में है. महज तीन सालों के बाद भारत डिजिटिल भुगतान के मामले में दुनिया में अव्वल होगा. वह चीन को पीछे छोड़ चुका होगा. इसलिए भारत के पास इस नई व्यवस्था का लाभ लेने का सुनहरा मौका है. जो पूर्व में नहीं था.

पांचवां: 1947 या 1990 के विपरीत दुनिया की नई रणनीति का मंच एशिया होगा. एशिया में भारत के बगैर किसी भी रणनीति के खेल के बारे में सोचना भी मुश्किल है.

छठा: अफगानिस्तान चार दशक के बाद अमेरिका (और रूस) की उपस्थिति से मुक्त होगा. इन चार दशकों में पाकिस्तान परमाणु शक्ति बना, पंजाब में प्रायोजित आंतकवाद फैला ( जिसे समाप्त कर दिया गया), फिर कश्मीर में प्रायोजित आतंकवाद फैलाया गया ( जिस पर भी काफी हद तक काबू पा लिया गया), इस दौरान पाकिस्तान ने भी भारत में आतंकी संगठनों को आर्थिक मदद पहुंचाई, विशेषतौर पर 1990 और 2000 के दशक के दौरान. लेकिन अमेरिका का पाकिस्तान पर वरदहस्त होने का वक्त भी अब जा चुका है. अफगानिस्तान में आने वाला वक्त कैसा होगा ये कहना तो मुश्किल है लेकिन इस सामरिक अवसर के रणनीतक परिणाम कई तरह से मिल सकते हैं.

सातवां: कोविड-19 के बाद दुनिया में व्यापार पहले जैसे नहीं होगा. इसका अहसास अब सभी को हो गया है. इस पूरे कोविड घटना क्रम के साथ जिस तरह से चीन का नाम जुड़ा है और अमेरिका ने इस पर सख्ती दिखाई है. उसके बाद से भारत के लिए व्यापारिक स्तर पर नए द्वार खुले हैं.

अंत में भारत का जो विश्व को लेकर एक अंतर्मुखी रवैया था, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बदौलत वो सोच बदली है और भारत अब पहले से कहीं ज्यादा मुखर हुआ है. मोदी ने भारत के दुनिया के साथ व्यवहार करने के तरीके को व्यवस्थित रूप से लेकिन पूरी तरह से बदल दिया है. अब भारत वो कम आत्मविश्वास वाला राष्ट्र नहीं रहा जिसे डर है कि उसे छोटा साबित कर दिया जाएगा. बल्कि एक ऐसा राष्ट्र और आत्मविश्वास से लबरेज लोग हैं जो खुद को मजबूती के साथ दुनिया के सामने खड़े रखने की हिम्मत रखते हैं.

पहला व्यक्तिगत क्वाड शिखर सम्मेलन 2006 में (जब ये विचार सबसे पहले सामने आया) नहीं 2021 में संभव हो सका. इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि पिछले दो दशकों में कितना कुछ बदल गया है.

(लेखक परिचरः लेखक ब्लूक्राफ्ट डिजिटल फाउंडेशन के सीईओ हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं.)

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