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Tuesday, October 19, 2021

Explained: इसरो के जीएसएलवी एफ 10 लॉन्च में कहां हुई चूक? जानिए सबकुछ

नई दिल्‍ली. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान परिषद (इसरो) के जियोसिन्क्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (जीएसएलवी) को ईओएस-3 अर्थ ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट को कक्ष में स्थापित करने में नाकाम हो गया. आइए समझते हैं कि कौन सी तकनीकी खामी ने भारत के तीसरे प्रयास को नाकाम कर दिया. जीएसएलवी ने आंध्र प्रदेश के श्रीहरीकोटा में स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से उड़ान भरी. उड़ान भरने के शुरुआती चरणों में, जिसमें चार स्ट्रैप – ऑन बूस्टर और पहला व दूसरा चरण शामिल था, सब कुछ योजना के मुताबिक ही चल रहा था. सब कुछ वैसा ही था जैसा कि रॉकेट के पेलोड फेयरिंग को अलग करने के लिए किया गया था. उड़ान भरने के 4 मिनट 55 सेकेंड के बाद, दूसरा चरण अलग हो गया और एक सेकेंड के बाद, ऊपरी स्टेज का क्रायोजेनिक इंजन भी चालू हो गया.

भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो के वेबकास्ट पर लॉन्च व्हीकल टेलीमेट्री के एनिमेशन के आधार पर ये बात सामने आई कि चरण की शुरुआत तो हुई लेकिन कुछ ही पलों में नियंत्रण खो दिया. एक बिंदु पर टेलीमेट्री स्क्रीन में दिखा कि स्टेज ने अपना एल्टिट्यूड और वेलोसिटी खो दी है, वहीं एनिमेशन में साफ तौर पर दिखा कि एटिट्यूड नियंत्रण खो दिया. फिर इसके बाद कुछ पल के लिए खामोशी छा गई और बाद में इसरो ने बताया कि लॉन्च असफल रहा है. कुल मिलाकर क्रायोजेनिक चरण चालू नहीं हो सका जिस वजह से मिशन असफल हो गया. इसरो के अध्यक्ष के. सिवन ने कहा कि क्रायोजेनिक चरण में कुछ तकनीकी खामी आ गई थी जिस वजह से मिशन सफल नहीं हो सका. उन्होंने मिशन की असफलता पर इसके अलावा विस्तार में कुछ भी जानकारी नहीं दी.

क्रायोजेनिक चरण क्या है?

क्रायोजेनिक चरण स्पेस लॉन्च व्हीकल का आखिरी चरण होता है, जिसमें भारी सामग्री को उठाकर स्पेस में ले जाने के लिए सामग्री को बहुत कम तापमान पर इस्तेमाल किया जाता है. क्रायोजेनिक इंजन प्रोपेल्लेन्ट्स के तौर पर लिक्विड हाइड्रोजन और लिक्विड ऑक्सीजन का इस्तेमाल करता है. दोनों अपने-अपने टैंक में मौजूद होते हैं. यहां से उसे अलग अलग बूस्टर पंप के जरिए टर्बो पंप में पंप किया जाता है, जिससे प्रोपेल्लेन्ट्स का तेज प्रवाह दहन कक्ष में पहुंचना सुनिश्चित हो सके.

ये भी पढ़ें : आने वाले कुछ वर्षों में बच्चों की बीमारी बन सकती है ‘कोरोना’, शोध में सामने आई हैरान करने वाली बात

लॉन्च क्यों अहमियत रखता है?

रिपोर्ट बताती है कि आधुनिक इमेंजिग सैटेलाइट अपने उच्च रेजोल्यूशन वाले कैमरे के साथ भारत की ज़मीन और समुद्री पर निगरानी की तस्वीर को पूरी तरह बदल कर रख देगा. यही नहीं रक्षा क्षेत्र में इसका खास महत्व होगा और इसके ज़रिये सुरक्षा के दृष्टिकोण से देश की सीमाओं पर खास ध्यान दिया जा सकेगा. यहीं नहीं प्राकृतिक आपदा के मामले में सैटेलाइट की निगरानी की बदौलत पहले से सावधानी बरती जा सकेगी और आपदा के असर को कम किया जा सकेगा. इसके अलावा कृषि, वन, खनिज, बर्फ, ग्लेशियर और समुद्रीस्थल के मामले में भी ये एक अहम योगदान देगा. इसरो के मुताबिक सैटेलाइट में विभिन्न बैंड पर मल्टीस्पेक्ट्रल और हायपरस्पेक्ट्रल कैमरा भी होंगे, जिससे बेहतर और स्पष्ट तस्वीर प्राप्त हो सकेगी.

इसके लॉन्च होने में देरी क्यों हुई

कोविड-19 महामारी से लेकर तकनीकी परेशानियों की वजह से जीसेट-1 की लॉन्चिंग को कई बार टालना पड़ा और फरवरी 2021 में हुए 18 छोटे लॉन्च के बाद इसरो का अब तक का दूसरा लॉन्च है. वैसे इसे 5 मार्च 2020 में लॉन्च होना था लेकिन कुछ तकनीकी वजहों से लॉन्चिंग को टाल दिया गया. उसके बाद महामारी और लॉकडाउन के चलते इसकी लॉन्चिंग टलती गई.

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