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Friday, January 28, 2022

US की वापसी, खलीलजाद हुए फेल! फिर तालिबान को मिला मौका, जानिए कैसे संभलेगा अफगानिस्तान?

नई दिल्ली. तालिबान अफगानिस्तान (Taliban in Afghanistan) पर अपनी पकड़ लगातार मजबूत करता जा रहा है. अमेरिकी सेना (US Forces) के अगस्त के आखिर तक पूरी तरह काबुल छोड़ने से पहले तालिबान ने कई महत्वपूर्ण प्रांतों पर कब्जा जमा लिया है. तालिबान की हिंसा को देखते हुए उत्तरी अफगानिस्तान (North Afghanistan) के इलाकों से हजारों की संख्या में लोगों का पलायन शुरू हो गया है. लोग अपना शहर और गांव छोड़कर भागने लगे हैं, वहीं अफगान सुरक्षा बलों की कोशिश तालिबानी फौज को रोकने की है. काबुल की सड़कों पर सैकड़ों की संख्या में लोगों को देखा जा सकता है, किसी ने पार्क में शरण ले रखी है, तो कोई सड़कों पर जिंदगी गुजार रहा है.

अफगानिस्तान के उत्तरी इलाकों में तालिबान की हिंसा का सामना करने वाले परिवारों ने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा कि इलाके पर कब्जे के बाद तालिबान ने अफगान सेना में भर्ती जवानों के परिवार में मौजूद पुरुषों को ढूंढ़कर मारना शुरू कर दिया और औरतों पर नई-नई पाबंदियां लगा दी हैं. उत्तरी अफगानिस्तान बम धमाकों, गोलीबारी और एयर स्ट्राइक से दहला हुआ है. तालिबान और अफगान सुरक्षा बलों के बीच क्रास फायरिंग में आम लोग मारे जा रहे हैं.

‘बाइडन को अपने फैसले पर पछतावा नहीं’

अफगानिस्तान की स्थिति को देखकर ऐसा लग रहा है कि जल्द ही तालिबान पूर्ण नियंत्रण स्थापित कर लेगा. हाल के दिनों में हिंसा बढ़ी है और लोग अफगान सरकार को लेकर आक्रोशित हैं. हालांकि अमेरिकी मदद के बिना तालिबान के आगे अफगान सरकार बेबस नजर आ रही है. अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन (Joe Biden) ने मंगलवार को एक बार फिर दोहराया कि अमेरिकी फौजों की अफगानिस्तान से वापसी की प्रक्रिया में कोई बदलाव नहीं होगा. बाइडन ने अफगानिस्तान से 11 सितंबर तक अमेरिकी फौजों की पूर्ण वापसी का आदेश दिया है. पेंटागन ने पहले ही अफगानिस्तान से अपने 90 प्रतिशत सैनिक वापस बुला लिए हैं.

‘अपने मुल्क के लिए लड़ें अफगान’

व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बातचीत में बाइडन ने कहा, “मौजूदा प्लान में कोई बदलाव नहीं होगा. 20 सालों में हमने अरबों रुपये खर्च किए हैं. 3 लाख से ज्यादा अफगान सैनिकों को ट्रेंड किया है. अफगानिस्तान के नेताओं को साथ आना चाहिए. हमने हजारों लोगों को खोया है. मौत और दुर्घटना में. हजारों सैनिकों ने अपनी कुर्बानी दी है. उन्हें अपने लिए लड़ना होगा. अपने देश के लिए लड़ना होगा.” बाइडन ने कहा, ‘अफगान नेताओं को अब समझ आने लगा है कि उन्हें इस स्थिति से निपटने के लिए एक साथ आना होगा. अमेरिका अपना सहयोग जारी रखेगा, लेकिन मुझे अपने फैसले पर पछतावा नहीं है.’

जाल्मी खलीलजाद की असफलता!

अफगानिस्तान के अमेरिका से निकलने और तालिबान के हिंसक होने के बाद सारा ध्यान जाल्मी खलीलजाद (Zalmay Khalilzad) शिफ्ट हो गया है. अफगानिस्तान में जन्मे खलीलजाद अफगानिस्तान सुलह मामले में अमेरिका के विशेष प्रतिनिधि हैं. उन्हें अमेरिका और तालिबान के बीच बातचीत और सैनिकों की वापसी का मुख्य आर्किटेक्ट माना जाता है. खलीलजाद की दलील रही है कि तालिबान पहले जैसा नहीं रहा है, जिसने 9/11 से पहले की कूटनीति में क्लिंटन प्रशासन को धोखा दिया था. उन्होंने कहा था कि नई सैन्य रणनीति के बिना अफगानिस्तान सरकार के लिए कोई समझौता हासिल कर पाना संभव नहीं होगा और तालिबान के बढ़ते प्रभाव के बीच यह आवश्यक हो गया है कि वह अपने सैन्य प्रभाव को हासिल करे.

खलीलजाद पर उठे सवाल!

लेकिन, खलीलजाद के दावे अब धराशायी हो रहे हैं और वे खुद अपनी बात से पलट गए हैं. खलीलजाद को शांति प्रक्रिया से बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं है, क्योंकि खुद खलीलजाद का यह कहना है कि अफगानिस्तान में सैन्य स्थिति में बदलाव को देखते हुए तालिबान अगली सरकार में अपने लिए बड़ा हिस्सा मांग रहे हैं. विशेषज्ञ भी इस बात को मान रहे हैं कि खलीलजाद असफल हो गए हैं और उन्हें घर वापस बुलाने की जरूरत है.

वॉशिंगटन एक्जामिनर में लिखे अपने लेख में अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो माइकल रूबिन ने कहा, “उनके आकलन गलत साबित हुए हैं और पूरी प्रक्रिया पर से वे अपना नियंत्रण भी खो बैठे हैं. अब वे वहां हस्तक्षेप कर रहे हैं, जहां अफगानी उन्हें चाहते ही नहीं. ये समय पहले दिन से इंटेलिजेंस की असफलता, खराब अनुमान और शांति प्रक्रिया को लेकर गलत फैसले की जांच करने का है.”

शांति वार्ता के खिलाफ हैं विशेषज्ञ

अफगानिस्तान में तालिबान के साथ शांति वार्ता को लेकर भी कई विशेषज्ञ खिलाफ हैं. उनका कहना है कि अमेरिकी फौजों के निकलने के बाद तालिबान ने अपने नियंत्रण वाले इलाकों में जमकर आतंक मचाया है. तक्षशिला इंस्टीट्यूट में स्ट्रेटजिक स्टडीज प्रोग्राम के डायरेक्टर और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय में पूर्व मिलिट्री सलाहकार रहे लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) डॉक्टर प्रकाश मेनन ने द प्रिंट में लिखे अपने लेख में तालिबान से साथ शांति वार्ता को शैतान के साथ समझौता करार दिया.

मेनन ने लिखा, “छोटी अवधि में तालिबान इस तरह के खतरे को कम करने का आश्वासन दे सकता है. लेकिन यह एक ऐसा जुआ है, जो लंबी अवधि में क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर वापस आ सकता है. चीन को पाकिस्तान के साथ पर्याप्त सहयोग मिल रहा है, लेकिन उसने तालिबान के साथ डील करने में अपनी भलाई समझी.” उन्होंने लिखा, “अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अखाड़े के बाहर से बैठकर खेल का मजा लेने के बजाय तालिबान को कुचलने के लिए सही विकल्पों का साथ देना चाहिए.”

मदद करेंगे उज्बेकिस्तान और पाकिस्तान?

पाकिस्तान को अफगानिस्तान में शांति की अहम कड़ी माना जाता है. तालिबान की लीडरशिप पाकिस्तान में बैठती है और इस्लामाबाद इनके साथ मिलकर अपने हितों को अंजाम देता है. इस्लामाबाद ने शांति वार्ता के लिए तालिबान पर दबाव भी बनाया था, लेकिन अब उसका कहना है कि उसके संबंध कमजोर पड़ रहे हैं. कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि उज्बेकिस्तान और पाकिस्तान युद्धग्रस्त अफगानिस्तान को अपने पैरों पर खड़ा करने में मदद कर सकते हैं.

द डिप्लोमेट के मुताबिक उज्बेकिस्तान और पाकिस्तान अपने ट्रेड रूट का ज्यादा से ज्यादा उपयोग करते हुए अपनी अर्थव्यवस्था को बढ़ा सकते हैं, साथ ही क्षेत्रीय व्यापार को मजबूत करते हुए अफगानिस्तान को भी अपने पैरों पर खड़ा होने में मदद कर सकते हैं.

रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका सेंट्रल एशियाई देशों को एक प्लेटफॉर्म उपलब्ध करा सकता है. साथ ही अमेरिका-अफगानिस्तान-उज्बेकिस्तान और पाकिस्तान का क्वाड ग्रुप एक डिप्लोमेटिक प्लेटफॉर्म के तौर पर क्षेत्रीय संपर्क बढ़ाने पर फोकस कर सकता है. इससे अफगानिस्तान में लंबे समय तक शांति और स्थिरता का माहौल बन सकेगा.

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