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Wednesday, January 19, 2022

पेगासस विवाद: केंद्र सरकार ने कराए नेताओं और पत्रकारों के फोन टैप? सुप्रीम कोर्ट में 5 अगस्त को सुनवाई

नई दिल्ली।इजरायली सॉफ्टवेयर पेगासस के जरिए भारत के कई राजनेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और पत्रकारों के फोन टैप करने के आरोप पर सुम्रीम कोर्ट सुनवाई के लिए तैयार है और पांच अगस्त को इस मामले में सुनावई होगी। आपको बता दें कि जासूसी के ये आरोप केंद्र सरकार पर लगे हैं। इसका असर मौजूदा मॉनसून सत्र पर भी देखने को मिल रहा है। संसद में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच गतिरोध कायम है। विपक्ष लगातार गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे की मांग कर रहा है। 

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को पेगासस विवाद की स्वतंत्र जांच की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई का फैसला किया था। अब इसकी तारीख भी तय कर दी गई है, जो कि पांच अगस्त है। वरिष्ठ पत्रकार एन. राम और शशि कुमार की ओर से दायर अर्जी पर वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने पक्ष रखा। उनका पक्ष सुनने का बाद सुप्रीम कोर्ट सुनवाई के लिए तैयार हुआ।

प्रधान न्यायाधीश एन वी रमन्ना की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष पेश कपिल सिब्बल ने कहा कि कथित जासूसी के व्यापक असर को देखते हुए इस पर सुनवाई की जरूरत है। इस पर प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ‘हम इसे अगले हफ्ते के लिए सूचीबद्ध करेंगे।’  याचिका में कहा गया कि कथित जासूसी भारत में विरोध की स्वतंत्र अभिव्यक्ति को दबाने और हतोत्साहित करने के एजेंसियों एवं संगठनों के प्रयास की बानगी है।

गौरतलब है कि एक अंतरराष्ट्रीय मीडिया संघ ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि 300 से अधिक सत्यापित भारतीय मोबाइल फोन नंबरों को इजराइल के पेगासस स्पाइवेयर के जरिए निगरानी के लिए संभावित लक्ष्यों की सूची में रखा गया। यह अर्जी 27 जुलाई को दायर की गई थी, जिसमें किसी मौजूदा या फिर रिटायर्ड जज की अगुवाई में मामले की जांच कराने की मांग की गई है। 

जनहित याचिका में यह मांग भी की गई है कि सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार को आदेश दे कि वह बताए कि आखिर उसने पेगासस स्पायवेयर का इस्तेमाल करने का आदेश लिया है या नहीं। याचिका में कहा गया है कि यह मिलिट्री स्पायवेयर है और इसका आम नागरिकों पर इस्तेमाल होना स्वीकार नहीं किया जा सकता। अर्जी में कहा गया है कि इस तरह की जासूसी निजता के अधिकार का उल्लंघन है, जिसे संविधान के आर्टिकल 14 में मूल अधिकार बताया गया है। इसके अलावा अभिव्यक्ति और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों का भी यह हनन है।

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